लेखिका – तबस्सुम अब्बास
इस्लामी इतिहास में कुछ ऐसी महान हस्तियां हैं जिनका नाम सुनते ही वफ़ादारी, बहादुरी और कुर्बानी की तस्वीर आंखों के सामने आ जाती है। हज़रत अब्बास अलमदार (अलैहिस्सलाम) ऐसी ही एक अज़ीम शख्सियत हैं, जिन्हें दुनिया “बाबुल हवाइज”, “क़मर-ए-बनी हाशिम” और “अलमदार-ए-कर्बला” के नाम से याद करती है। आपने अपने भाई हज़रत इमाम हुसैन (अलैहिस्सलाम) की मदद और हक़ की रक्षा के लिए ऐसी मिसाल कायम की, जो क़यामत तक इंसानियत के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी रहेगी।
जन्म और प्रारंभिक जीवन
हज़रत अब्बास (अलैहिस्सलाम) का जन्म 4 शाबान 26 हिजरी को मदीना मुनव्वरा में हुआ। आपके वालिद चौथे ख़लीफ़ा और रसूलुल्लाह ﷺ के चचेरे भाई हज़रत अली इब्ने अबी तालिब (अलैहिस्सलाम) थे, जबकि आपकी वालिदा हज़रत उम्मुल बनीन (रज़ियल्लाहु अन्हा) थीं। बचपन से ही आपने अपने पिता से इल्म, शुजाअत और तक़वा की तालीम हासिल की।
हज़रत अब्बास (अलैहिस्सलाम) अपनी खूबसूरती, ऊंचे अख़लाक़ और बेमिसाल बहादुरी के कारण “क़मर-ए-बनी हाशिम” अर्थात “बनी हाशिम का चाँद” कहलाए।
इमाम हुसैन से अटूट मोहब्बत
हज़रत अब्बास (अलैहिस्सलाम) को अपने बड़े भाई हज़रत इमाम हुसैन (अलैहिस्सलाम) से बेहद मोहब्बत थी। आपने हमेशा इमाम हुसैन को अपना मौला और रहबर माना। कर्बला के सफर में भी आपने हर कदम पर अपने भाई का साथ दिया और आख़िरी सांस तक उनकी हिफाज़त की।
कर्बला में हज़रत अब्बास का किरदार
10 मुहर्रम 61 हिजरी को कर्बला के मैदान में जब यज़ीदी फौज ने इमाम हुसैन (अलैहिस्सलाम) और उनके साथियों पर पानी बंद कर दिया, तब बच्चों और ख़वातीन की प्यास असहनीय हो गई। हज़रत अब्बास (अलैहिस्सलाम) ने फरात नदी से पानी लाने का बीड़ा उठाया।
आपने अपनी बहादुरी से दुश्मन के घेरे को तोड़कर फरात तक पहुंचने में सफलता हासिल की। जब आपने पानी भरा और खुद पानी पीने का अवसर मिला तो अपने प्यासे भाई और अहलेबैत की याद में पानी नहीं पिया। यह वफ़ादारी और ईसार की ऐसी मिसाल है, जिसकी दुनिया में दूसरी मिसाल मिलना मुश्किल है।
“ऐ नफ़्स! हुसैन प्यासे हैं और तू पानी पीए? ख़ुदा की कसम, यह वफ़ादारों का तरीका नहीं।”
शहादत का दर्दनाक मंज़र
जब हज़रत अब्बास (अलैहिस्सलाम) मश्क में पानी भरकर खेमों की ओर लौट रहे थे, तो दुश्मनों ने चारों तरफ़ से हमला कर दिया। पहले आपका दायां हाथ और फिर बायां हाथ काट दिया गया, लेकिन आपने मश्क को गिरने नहीं दिया। आखिरकार एक तीर मश्क पर लगा और एक वार आपके सर पर किया गया, जिससे आप ज़मीन पर गिर पड़े।
आपकी आवाज़ सुनकर इमाम हुसैन (अलैहिस्सलाम) आपके पास पहुंचे। अपने वफ़ादार भाई की यह हालत देखकर इमाम हुसैन की आंखें नम हो गईं। हज़रत अब्बास (अलैहिस्सलाम) ने 10 मुहर्रम 61 हिजरी को शहादत का जाम पिया और हमेशा के लिए अमर हो गए।
हज़रत अब्बास की सीरत से मिलने वाले संदेश
हज़रत अब्बास (अलैहिस्सलाम) की ज़िंदगी हमें कई अहम सबक देती है—
- हक़ और सच्चाई के लिए हर कुर्बानी देने का जज़्बा।
- भाईचारे, वफ़ादारी और मोहब्बत की मिसाल।
- मुश्किल हालात में सब्र और इस्तिक़ामत।
- अपनी ज़रूरतों पर दूसरों की ज़रूरतों को तरजीह देना।
- ज़ुल्म और नाइंसाफी के सामने झुकने से इंकार।
हज़रत अब्बास अलमदार (अलैहिस्सलाम) की शहादत केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं, बल्कि इंसानियत, वफ़ा और ईमानदारी का ऐसा पैगाम है जो हर दौर में ज़िंदा रहेगा। कर्बला का मैदान आज भी हमें यह सिखाता है कि हक़ की राह में आने वाली हर मुश्किल को सब्र और हिम्मत से पार किया जा सकता है। हज़रत अब्बास (अलैहिस्सलाम) ने अपने अमल से साबित कर दिया कि वफ़ादारी केवल शब्द नहीं, बल्कि जान की बाज़ी लगाकर निभाया जाने वाला अहद है।
सलाम हो हज़रत अब्बास अलमदार (अलैहिस्सलाम) पर, जिनकी वफ़ा और कुर्बानी का सूरज क़यामत तक रोशनी बिखेरता रहेगा।

