संदेह, सामरिक दूरी और ठंडे संवाद की राजनीति**
विश्लेषण | अज़हर उमरी
बांग्लादेश की राजनीतिक इतिहास में बेगम खालिदा ज़िया एक निर्णायक व्यक्तित्व के रूप में दर्ज हैं। दो बार प्रधानमंत्री रहीं—1991–1996 और 2001–2006—खालिदा ज़िया का कार्यकाल केवल सत्ता-परिवर्तन का दौर नहीं था, बल्कि दक्षिण एशिया की कूटनीति में उभरते नए समीकरणों की परीक्षा भी था। भारत–बांग्लादेश संबंधों के संदर्भ में यह कालखंड संभावनाओं से भरा, लेकिन अविश्वास से घिरा रहा।
राष्ट्रवाद की राजनीति और भारत को लेकर आशंका
खालिदा ज़िया के नेतृत्व में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) ने बांग्लादेशी राष्ट्रवाद को अपनी राजनीति की धुरी बनाया। इस राष्ट्रवादी विमर्श में भारत को लेकर एक अंतर्निहित संदेह स्पष्ट रूप से मौजूद था।
BNP के भीतर यह धारणा गहराई से जमी रही कि भारत क्षेत्रीय वर्चस्व स्थापित करने की कोशिश करता है और बांग्लादेश के आंतरिक मामलों में उसका प्रभाव बढ़ रहा है। यही मानसिकता द्विपक्षीय रिश्तों में सहजता और रणनीतिक भरोसे के निर्माण में सबसे बड़ी बाधा बनी।
सीमा और सुरक्षा: अविश्वास का स्थायी कारण
खालिदा ज़िया के दौर में भारत–बांग्लादेश सीमा केवल एक भौगोलिक रेखा नहीं, बल्कि राजनीतिक तनाव का केंद्र बन गई।
भारत के पूर्वोत्तर राज्यों में सक्रिय उग्रवादी संगठनों को लेकर नई दिल्ली बार-बार यह आरोप लगाती रही कि उन्हें बांग्लादेश की धरती पर शरण और समर्थन मिल रहा है। ढाका सरकार ने इन आरोपों को खारिज किया, लेकिन सुरक्षा और खुफिया सहयोग के अभाव ने दोनों देशों के बीच अविश्वास को लगातार गहराया।
सीमा पर बीएसएफ और बांग्लादेशी सुरक्षा बलों के बीच टकराव की घटनाएँ इस तनाव की ज़मीनी अभिव्यक्ति बनती रहीं।
अवैध प्रवासन: कूटनीति से अधिक घरेलू राजनीति
अवैध प्रवासन का मुद्दा खालिदा ज़िया के कार्यकाल में भारत–बांग्लादेश संबंधों का सबसे संवेदनशील प्रश्न बना रहा।
भारत में यह मसला सामाजिक और राजनीतिक विमर्श का केंद्र था, जबकि बांग्लादेश की सरकार इसे अक्सर अतिरंजित आरोप मानती रही। आपसी विश्वास की कमी के चलते यह प्रश्न किसी ठोस, दीर्घकालिक समाधान तक नहीं पहुँच सका और द्विपक्षीय रिश्तों पर इसका दबाव बना रहा।
जल बंटवारा और सीमित आर्थिक साझेदारी
नदी जल बंटवारे—विशेष रूप से तीस्ता नदी समझौता—पर खालिदा ज़िया के दौर में कोई निर्णायक प्रगति नहीं हो सकी।
व्यापारिक रिश्ते पूरी तरह ठप नहीं हुए, लेकिन उनमें वह राजनीतिक इच्छाशक्ति और दूरदृष्टि नहीं दिखी, जो आर्थिक सहयोग को रणनीतिक साझेदारी में बदल सके। सहयोग मौजूद था, पर संकोच और सीमाओं के भीतर।
2001–2006: रिश्तों की सबसे ठंडी परत
खालिदा ज़िया के दूसरे कार्यकाल को भारत–बांग्लादेश संबंधों का सबसे ठंडा और जटिल दौर माना जाता है।
इस अवधि में—
- उच्चस्तरीय राजनीतिक संवाद न्यूनतम रहा
- सुरक्षा और खुफिया सहयोग लगभग निष्क्रिय हो गया
- भारत-विरोधी बयानबाज़ी घरेलू राजनीति का औज़ार बन गई
हालाँकि औपचारिक राजनयिक संबंध कायम रहे, लेकिन भरोसे और सकारात्मक संवाद की स्पष्ट कमी दिखाई दी।
शेख हसीना से तुलना: दो अलग दृष्टियाँ
खालिदा ज़िया और शेख हसीना के दौर की तुलना भारत–बांग्लादेश संबंधों की दिशा को स्पष्ट करती है।
जहाँ खालिदा ज़िया की राजनीति में भारत के प्रति संदेह और दूरी प्रमुख रही, वहीं शेख हसीना के नेतृत्व में सुरक्षा सहयोग, आतंकवाद-विरोधी साझेदारी और क्षेत्रीय स्थिरता को प्राथमिकता मिली। यही कारण है कि दोनों नेताओं के कार्यकाल को द्विपक्षीय संबंधों के दो अलग-अलग मॉडल के रूप में देखा जाता है।
खालिदा ज़िया का दौर भारत–बांग्लादेश संबंधों में न तो टकराव का युग था और न ही साझेदारी का स्वर्णकाल। यह एक संक्रमणकाल था—जहाँ सहयोग की संभावनाएँ मौजूद थीं, लेकिन राजनीतिक अविश्वास ने उन्हें साकार नहीं होने दिया।
फिर भी, इसी दौर के अनुभवों ने आगे चलकर रिश्तों को नई दिशा देने की ज़मीन तैयार की।
खालिदा ज़िया का राजनीतिक अध्याय यह स्पष्ट करता है कि पड़ोसी देशों के रिश्ते केवल साझा इतिहास या भूगोल से नहीं, बल्कि नेतृत्व की दृष्टि, राजनीतिक मानसिकता और आपसी भरोसे से तय होते हैं।

