लेखिका – तबस्सुम अब्बास ( शिक्षिका और सामाजिक चिंतक )
23 मार्च भारतीय इतिहास का वह स्वर्णिम और साथ ही वेदनापूर्ण दिन है, जब देश ने अपने तीन सपूतों—भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव—को खो दिया। यह दिन केवल एक तारीख नहीं, बल्कि बलिदान, साहस और देशभक्ति की सर्वोच्च मिसाल है, जिसे हर भारतीय गर्व और श्रद्धा के साथ याद करता है।
सन् 1931 में इसी दिन अंग्रेजी हुकूमत ने इन तीनों क्रांतिकारियों को लाहौर जेल में फांसी दे दी थी। इन वीरों का अपराध केवल इतना था कि उन्होंने अपने देश को आजाद देखने का सपना देखा और उस सपने को साकार करने के लिए अपने प्राणों की आहुति देने से भी पीछे नहीं हटे।
भगत सिंह का नाम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में अंकित है। उनकी सोच, उनकी लेखनी और उनके क्रांतिकारी विचार आज भी युवाओं को प्रेरित करते हैं। उन्होंने “इंकलाब जिंदाबाद” का नारा देकर पूरे देश में आजादी की अलख जगाई। वहीं राजगुरु अपनी अदम्य साहस और निशानेबाजी के लिए प्रसिद्ध थे, जबकि सुखदेव ने संगठनात्मक रूप से क्रांतिकारी आंदोलन को मजबूत किया।
इन तीनों वीरों ने मिलकर ब्रिटिश अधिकारी सांडर्स की हत्या की, जो कि लाला लाजपत राय की मौत का बदला था। इस घटना ने अंग्रेजी शासन की नींव हिला दी और पूरे देश में क्रांति की लहर पैदा कर दी। इसके बाद भगत सिंह और उनके साथियों ने केंद्रीय विधानसभा में बम फेंककर अपनी आवाज बुलंद की, जिसका उद्देश्य किसी को नुकसान पहुंचाना नहीं, बल्कि अंग्रेजों के कानों तक अपनी बात पहुंचाना था।
फांसी से पहले भी इन तीनों क्रांतिकारियों के चेहरे पर भय का कोई चिन्ह नहीं था। वे हंसते-हंसते फांसी के फंदे पर झूल गए और अपने प्राणों की आहुति देकर देशवासियों को आजादी की राह दिखा गए। उनका यह बलिदान आने वाली पीढ़ियों के लिए एक अमर प्रेरणा बन गया।
आज जब हम स्वतंत्र भारत में सांस ले रहे हैं, तो यह आवश्यक है कि हम इन महान क्रांतिकारियों के बलिदान को न केवल याद करें, बल्कि उनके आदर्शों को अपने जीवन में उतारें। देश के प्रति समर्पण, निस्वार्थ सेवा और अन्याय के खिलाफ आवाज उठाना ही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
23 मार्च हमें यह सिखाता है कि देश के लिए जीना और यदि आवश्यकता पड़े तो मर मिटना ही सच्ची देशभक्ति है। भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव का बलिदान हमेशा-हमेशा के लिए भारतीयों के दिलों में जीवित रहेगा।

