लेखक। अज़हर उमरी
(वरिष्ठ पत्रकार एवं सामाजिक चिंतक)
समाज की असल पहचान उसके व्यवहार से होती है। हम अक्सर बड़े-बड़े उसूलों और नैतिकता की बातें करते हैं, लेकिन जब बात व्यवहार की आती है तो वही इंसान कई बार दोहरे मापदंड अपना लेता है। खासकर बेटियों के मामले में यह विरोधाभास साफ दिखाई देता है। अपनी बेटी के लिए जो सुरक्षा, सम्मान और खुशियां हम चाहते हैं, क्या वही सोच हम दूसरों की बेटियों के लिए भी रखते हैं?
“किसी की बेटी को इतनी ही तकलीफ दो, जितनी अपनी बेटी के लिए बर्दाश्त कर सको”—यह सिर्फ एक वाक्य नहीं, बल्कि इंसानियत का सबसे सच्चा पैमाना है। यह हमें याद दिलाता है कि हर बेटी किसी की जान, किसी का सपना और किसी का विश्वास होती है। जब हम किसी और की बेटी के साथ अन्याय करते हैं, तो दरअसल हम उसी दर्द को जन्म देते हैं जिसे हम अपने घर में कभी देखना नहीं चाहते।
आज के दौर में समाज को सबसे ज्यादा जरूरत इसी सोच की है। अपराध, अत्याचार और अन्याय की घटनाएं तब तक खत्म नहीं होंगी, जब तक हम दूसरों को भी उतना ही मान-सम्मान नहीं देंगे जितना अपने लिए चाहते हैं। अगर हर इंसान अपने दिल में यह तय कर ले कि वह किसी के साथ वही करेगा जो वह अपने लिए सही मानता है, तो समाज में आधे से ज्यादा बुराइयां अपने आप खत्म हो जाएंगी।
“दुनिया गोल है”—यह कहावत भी यही सिखाती है कि जो हम दूसरों के साथ करते हैं, वह किसी न किसी रूप में हमारे पास वापस जरूर आता है। कुदरत का न्याय भले ही देर से दिखे, लेकिन वह अचूक होता है। इसलिए बेहतर यही है कि हम अपने कर्मों को सुधार लें, ताकि हमें पछताना न पड़े।
अंत में, यह बात समझना जरूरी है कि बेटियां सिर्फ किसी एक घर की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि पूरे समाज की इज्जत होती हैं। अगर हम सच में एक बेहतर समाज बनाना चाहते हैं, तो हमें अपने नजरिए को बदलना होगा—दूसरों की बेटियों को भी अपनी बेटी समझना होगा।
यही सोच इंसानियत की असली पहचान है।

