लखनऊ। उत्तर प्रदेश के स्ववित्तपोषित डिग्री कॉलेज इन दिनों आर्थिक तंगी से गुजर रहे हैं। घटती छात्र संख्या ने कालेजों की आय पर गहरा असर डाला है, जिससे संस्थानों के सामने अस्तित्व का संकट खड़ा हो गया है। ऐसे में प्रदेश सरकार ने राहत देने की दिशा में कदम तेज कर दिए हैं।
सरकार ने शिक्षकों और प्राचार्यों की भर्ती प्रक्रिया को आसान बनाने के लिए तीन सदस्यीय समिति का गठन किया है, जो 10 दिन में अपनी रिपोर्ट सौंपेगी। इसी रिपोर्ट के आधार पर नई भर्ती नीति लागू की जाएगी।
वर्तमान नियमों के तहत भर्ती में चार विशेषज्ञों की अनिवार्यता और एक पद पर तीन अभ्यर्थियों की शर्त कालेजों पर भारी पड़ रही है। कई विषयों में पर्याप्त योग्य उम्मीदवार नहीं मिल पा रहे हैं, जिससे पद लंबे समय तक खाली रह जाते हैं। अब प्रस्ताव है कि उपलब्ध योग्य अभ्यर्थियों में से ही चयन किया जाए।
प्राचार्य पद के लिए अनुभव की शर्त को भी आसान बनाने की तैयारी है। 10 वर्ष का शिक्षण अनुभव पर्याप्त मानने पर विचार किया जा रहा है। साथ ही, शिक्षकों और प्राचार्यों को पहले 10 वर्षों के लिए अस्थायी अनुमोदन देकर बाद में स्थायी करने का विकल्प भी प्रस्तावित है।
चयन समितियों में अनुभवी शिक्षकों को शामिल करने की सिफारिश भी सामने आई है।
सरकार के इन प्रस्तावित बदलावों से स्ववित्तपोषित कॉलेजों को बड़ी राहत मिलने की उम्मीद है और भर्ती प्रक्रिया भी अधिक व्यावहारिक व सरल हो सकेगी।

