लेखक। अज़हर उमरी (वरिष्ठ पत्रकार)
हरम शरीफ़ में कदम रखते ही ज़मीन ठंडी क्यों महसूस होती है, जबकि बाहर सूरज की तेज़ तपिश रहती है? यह सवाल हर आम यात्री के दिमाग़ में आता है। इसका जवाब सिर्फ़ इंजीनियरिंग या वास्तुकला नहीं, बल्कि अल्लाह की कुदरत और इंसानी लगन का अद्भुत संगम है।
मक्का के मताफ़ में इस्तेमाल किया गया संगमरमर ग्रीस के थासोस द्वीप से लाया गया खास सफ़ेद पत्थर है। इसकी एक अद्भुत ख़ासियत है: यह सूरज की गर्मी और रौशनी का बड़ा हिस्सा परावर्तित कर देता है। इसलिए बाहर की तेज़ धूप में भी इस पर चलने पर ठंडक का एहसास होता है।
यह पत्थर लगभग पाँच सेंटीमीटर मोटाई में लगाया गया है, ताकि वह लंबे समय तक ठंडा बना रहे। खास बात यह है कि नीचे किसी ठंडे पानी की पाइप या एयर कंडीशनिंग का इस्तेमाल नहीं किया गया। यह सिर्फ़ प्राकृतिक गुण और बेहतरीन इंजीनियरिंग का कमाल है, जिसे मिस्र के मशहूर इंजीनियर डॉ. मोहम्मद कमाल इस्माइल ने योजनाबद्ध किया।
सालों बाद जब यही संगमरमर मस्जिद-ए-नबवी में इस्तेमाल के लिए चाहिए था, तो पता चला कि यह अब उपलब्ध नहीं। लेकिन अल्लाह ने राह बनाई। बचा हुआ पूरा मार्बल सऊदी अरब के एक गोदाम में सुरक्षित मिला। जब मालिक को पता चला कि इसे रोज़ा-ए-रसूल के लिए इस्तेमाल किया जाएगा, तो उन्होंने कहा, “अल्लाह की कसम, इसका कोई दाम नहीं लूंगा।”
यह सिर्फ़ पत्थर और इंजीनियरिंग की कहानी नहीं, बल्कि ईमान, लगन और अल्लाह की रहमत की भी मिसाल है।
आमीन! 🙏

