हज का मुकद्दस सीजन शुरू होते ही पुरानी यादें ताज़ा हो जाती हैं। एक समय था जब हज का सफर आज की तरह तेज़ और सुविधाजनक नहीं, बल्कि लंबा, धैर्यपूर्ण और भावनाओं से भरा हुआ हुआ करता था।

1970 के दशक से लेकर 1995 तक भारत से हाजियों को समुद्री जहाज़ों के ज़रिए भेजा जाता था। इनमें प्रमुख रूप से “अकबरी” और “नूरजहां” नामक जहाज़ शामिल थे। “अकबरी” जहाज़ में लगभग 1600 और “नूरजहां” में करीब 1800 हाजी सफर कर सकते थे। यह यात्रा मुंबई से शुरू होकर जेद्दा तक लगभग 15 से 20 दिनों में पूरी होती थी।
यह सफर केवल एक यात्रा नहीं, बल्कि इबादत, सब्र और आपसी भाईचारे का प्रतीक होता था। जहाज़ पर नमाज़, दुआ, तिलावत और आपसी मेल-जोल का एक अलग ही माहौल रहता था, जो आज भी बुजुर्ग हाजियों की यादों में ज़िंदा है।
अगर इतिहास में और पीछे जाएं, तो मुग़ल काल में भी समुद्री रास्ते से हज यात्रा की परंपरा थी। उस दौर में “सलीमी” और “इलाही” नामक जहाज़ सूरत से मक्का की ओर रवाना होते थे। यह सफर और भी लंबा और कठिन होता था, लेकिन आस्था की ताकत हर मुश्किल को आसान बना देती थी।
समय के साथ तकनीक ने तेज़ी से प्रगति की और हवाई यात्रा का चलन बढ़ा। आज हज कमेटी ऑफ इंडिया के माध्यम से सभी भारतीय हाजियों को हवाई जहाज़ों से सीधे सऊदी अरब भेजा जाता है, जिससे यात्रा अब कुछ घंटों में पूरी हो जाती है।
हालांकि सुविधाएं बढ़ी हैं और समय कम हुआ है, लेकिन समुद्री सफर की जो सादगी, अपनापन और रूहानियत थी, वह आज भी लोगों के दिलों में खास जगह रखती है।

