लेखक – अज़हर उमरी
(वरिष्ठ पत्रकार )
रोज़ा इस्लाम की महान इबादतों में से एक है। यह सिर्फ भूखे-प्यासे रहने का नाम नहीं, बल्कि सब्र, तौबा, परहेज़गारी और अल्लाह की इताअत का नाम है। अक्सर यह सवाल किया जाता है कि दुनिया का सबसे पहला रोज़ा किसने रखा?
इस्लामी परंपरा के अनुसार सबसे पहले इंसान और नबी हज़रत आदम अलैहिस्सलाम थे।
अल्लाह तआला ने उन्हें जन्नत में ठहराया और एक खास दरख़्त का फल खाने से मना किया। लेकिन शैतान के बहकावे में आकर उन्होंने वह फल खा लिया। इस घटना का ज़िक्र क़ुरआन की सूरह अल-बक़रा और सूरह अल-आ‘राफ़ में मिलता है।
इसके बाद उन्हें जन्नत से दुनिया में भेज दिया गया। दुनिया में आकर हज़रत आदम (अ.स.) ने सच्चे दिल से तौबा और इस्तिग़फ़ार किया। अल्लाह तआला ने उनकी तौबा क़ुबूल फरमाई और उन्हें माफ़ कर दिया।
📖 क्या सबसे पहला रोज़ा हज़रत आदम (अ.स.) ने रखा?
कुछ रिवायतों में बयान मिलता है कि हज़रत आदम (अ.स.) ने अपनी तौबा के इज़हार के तौर पर रोज़े रखे थे। मशहूर है कि उन्होंने हर महीने की 13, 14 और 15 तारीख (अय्याम-ए-बीज़) के रोज़े रखे।
लेकिन यह बात सहीह और मज़बूत हदीसों — जैसे सहीह बुखारी और सहीह मुस्लिम — से स्पष्ट रूप से साबित नहीं है। इसलिए एहतियात का तकाज़ा है कि इसे एक मशहूर रिवायत कहा जाए, न कि पुख्ता हदीस।
🌙 रोज़ा: एक प्राचीन इबादत
रोज़ा सिर्फ उम्मत-ए-मुहम्मदी ﷺ के लिए खास नहीं है।
अल्लाह तआला क़ुरआन में फरमाता है:
“ऐ ईमान वालों! तुम पर रोज़े फर्ज़ किए गए, जैसे तुमसे पहले लोगों पर फर्ज़ किए गए थे, ताकि तुम परहेज़गार बनो।”
(सूरह अल-बक़रा: 183)
इस आयत से साफ़ मालूम होता है कि रोज़ा पहले नबियों और उनकी उम्मतों में भी मौजूद था। यानी रोज़ा इंसानी इतिहास की बहुत पुरानी और रूहानी इबादत है।
✨ रोज़े का असली मक़सद
रोज़ा हमें सिखाता है:
- गुनाहों से बचना
- सब्र और शुक्र अदा करना
- गरीबों और जरूरतमंदों का एहसास करना
- अल्लाह से अपने रिश्ते को मजबूत करना
रोज़ा सिर्फ जिस्म की भूख नहीं, बल्कि दिल और रूह की पाकीज़गी का ज़रिया है।
हज़रत आदम (अ.स.) की तौबा इंसानियत के लिए उम्मीद का पैग़ाम है कि गलती के बाद भी अल्लाह की रहमत के दरवाज़े खुले हैं।
रोज़ा भी उसी तौबा, सब्र और अल्लाह की इताअत का ज़िंदा प्रतीक है।
अल्लाह तआला हमें रोज़े की असल रूह को समझने और उस पर अमल करने की तौफ़ीक़ अता फरमाए। आमीन।

