वरिष्ठ अधिवक्ता हितेंद्र गांधी ने मुख्य न्यायाधीश को लिखा पत्र
नई दिल्ली:वरिष्ठ अधिवक्ता हितेंद्र गांधी ने भारत के मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखकर अरावली पहाड़ियों की परिभाषा को लेकर सुप्रीम कोर्ट के हालिया आदेश पर पुनर्विचार या स्पष्टता की मांग की है। उन्होंने आशंका जताई है कि केवल ऊंचाई के आधार पर तय की गई परिभाषा उत्तर-पश्चिम भारत में पर्यावरण संरक्षण को कमजोर कर सकती है।
गौरतलब है कि 20 नवंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने “इन री: अरावली हिल्स एंड रेंजेज की परिभाषा से जुड़े मुद्दे” मामले में एक अहम आदेश पारित किया था। अदालत ने अरावली क्षेत्र को एक पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील प्राकृतिक ढाल के रूप में मान्यता दी थी और सतत खनन के लिए व्यापक प्रबंधन योजना तैयार करने, नई खनन लीज पर अंतरिम रोक लगाने तथा संचयी प्रभाव और वहन क्षमता के आकलन पर जोर दिया था। अधिवक्ता गांधी ने इन निर्देशों का स्वागत करते हुए इन्हें सकारात्मक पहल बताया है।
हालांकि, उन्होंने अदालत द्वारा अपनाई गई कार्यात्मक परिभाषा पर गंभीर चिंता जताई है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट के आदेश में उन भू-आकृतियों को अरावली पहाड़ियों के रूप में चिन्हित किया गया है, जिनकी स्थानीय ऊंचाई आसपास के क्षेत्र से 100 मीटर या उससे अधिक है। गांधी का तर्क है कि यह संकीर्ण दृष्टिकोण अरावली के बड़े हिस्सों को संरक्षण के दायरे से बाहर कर सकता है, जबकि वे पारिस्थितिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
उन्होंने रेखांकित किया कि अरावली पर्वत श्रृंखला दुनिया की सबसे प्राचीन पर्वतमालाओं में से एक है, जो समय के साथ काफी हद तक घिस चुकी है। इसकी पारिस्थितिक भूमिका केवल ऊंची चोटियों तक सीमित नहीं है, बल्कि कम ऊंचाई वाली पहाड़ियां, चट्टानी उभार, ढलान, जल पुनर्भरण क्षेत्र और आपसी संपर्क वाले भू-भाग भी भूजल संरक्षण, धूल और मरुस्थलीकरण को रोकने, जैव विविधता के संरक्षण और दिल्ली-एनसीआर के सूक्ष्म जलवायु संतुलन में अहम भूमिका निभाते हैं।
अधिवक्ता गांधी ने चेतावनी दी कि भारत में पर्यावरण संरक्षण अक्सर कानूनी वर्गीकरण और भूमि अभिलेखों से जुड़ा होता है। यदि परिभाषा अत्यधिक सीमित रही, तो ऐसे “ग्रे ज़ोन” बन सकते हैं, जहां खनन, निर्माण और भूमि उपयोग परिवर्तन को रोकना मुश्किल हो जाएगा, जिससे अपूरणीय क्षति हो सकती है।
पत्र में दिल्ली-एनसीआर की गंभीर वायु गुणवत्ता समस्या का भी उल्लेख किया गया है। उन्होंने कहा कि अरावली की रिज वनस्पतियां और उनसे जुड़े झाड़ीदार क्षेत्र धूल के प्रवाह को रोकने और प्रदूषक कणों को नियंत्रित करने में प्राकृतिक अवरोध का काम करते हैं। यदि इन क्षेत्रों को संरक्षण से बाहर रखा गया, तो वायु प्रदूषण, भूजल संकट, अत्यधिक गर्मी और वन्यजीव गलियारों के विखंडन जैसी समस्याएं और गहरी हो सकती हैं।
संवैधानिक आधार पर उन्होंने अनुच्छेद 21 के तहत स्वस्थ पर्यावरण के अधिकार, अनुच्छेद 48A और 51A(g) में निहित पर्यावरण संरक्षण के दायित्वों का हवाला दिया। साथ ही, एहतियाती सिद्धांत, पब्लिक ट्रस्ट सिद्धांत, सतत विकास और अंतर-पीढ़ी समानता जैसे स्थापित पर्यावरणीय सिद्धांतों को भी अपने तर्क का आधार बनाया।
अधिवक्ता गांधी ने मुख्य न्यायाधीश से आग्रह किया है कि इस मामले को उपयुक्त पीठ के समक्ष रखकर परिभाषा में संशोधन या स्पष्टता पर विचार किया जाए। उनके सुझावों में ऊंचाई के बजाय बहु-मानदंड आधारित दृष्टिकोण, भू-आकृतिक, जलवैज्ञानिक और पारिस्थितिक पहलुओं को शामिल करने, उपयोग में लिए गए डेटा और नक्शों की सार्वजनिक जांच सुनिश्चित करने तथा अंतिम प्रबंधन योजना लागू होने तक जुड़े क्षेत्रों की सुरक्षा जारी रखने की मांग शामिल है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि यह प्रस्तुति पूरी तरह जनहित में और न्यायालय के प्रति सम्मान के साथ की गई है, ताकि अरावली संरक्षण को लेकर सुप्रीम कोर्ट की मंशा ज़मीनी स्तर पर भी प्रभावी और सार्थक बनी रहे।

