लेखक – अजहर उमरी
( वरिष्ठ पत्रकार राजनीतिक विश्लेषक)
पश्चिम बंगाल की राजनीति हमेशा से आंदोलनों, जनसंघर्षों और सड़कों पर उतरकर सत्ता बदलने की परंपरा के लिए जानी जाती रही है। यही वजह है कि यहां की राजनीति को अक्सर ‘राजपथ की राजनीति’ कहा जाता है। आज़ादी के बाद भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से लेकर 1977 में वाम मोर्चा और फिर 2011 में तृणमूल कांग्रेस तक सत्ता परिवर्तन इसी जनांदोलन की धारा में हुआ।
इस राजनीतिक परंपरा की सबसे सशक्त प्रतीक बनीं ममता बनर्जी—एक ऐसी नेता, जिन्होंने खुद सड़कों पर संघर्ष करते हुए अपनी पहचान बनाई। लेकिन 2026 के विधानसभा चुनावों के रुझान इस बात का संकेत दे रहे हैं कि बंगाल की राजनीति एक नए मोड़ पर खड़ी है, जहां भारतीय जनता पार्टी पहली बार निर्णायक बढ़त बनाती दिख रही है।
संघर्ष से सत्ता तक: ममता का उभार
ममता बनर्जी का राजनीतिक सफर किसी कहानी से कम नहीं। उन्होंने 2000 के दशक में CPI(M) के गढ़ माने जाने वाले क्षेत्रों में चुनौती दी।
नंदीग्राम आंदोलन और सिंगूर आंदोलन उनके राजनीतिक जीवन के निर्णायक मोड़ साबित हुए। इन आंदोलनों ने न केवल वाम मोर्चा के खिलाफ जनाक्रोश पैदा किया, बल्कि ममता बनर्जी को जनता की सबसे मजबूत आवाज के रूप में स्थापित किया।
2011 में उन्होंने 34 साल पुरानी वाम सत्ता को खत्म कर इतिहास रच दिया।
सत्ता में चुनौतियां और विवाद
सत्ता में आने के बाद ममता सरकार ने कई जनकल्याणकारी योजनाएं शुरू कीं—महिलाओं, छात्रों और किसानों के लिए आर्थिक सहायता, सामाजिक सुरक्षा और विकास की योजनाएं।
लेकिन समय के साथ उनकी सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप भी गहराते गए। सारदा चिटफंड घोटाला, नारदा स्टिंग ऑपरेशन और शिक्षक भर्ती घोटाले जैसे मामलों ने सरकार की साख को झटका दिया।
BJP का उभार: एक नई चुनौती
2012 के बाद भारतीय जनता पार्टी ने बंगाल में तेजी से विस्तार किया।
ममता सरकार पर ‘तुष्टिकरण’ के आरोप लगे, जिससे समाज में ध्रुवीकरण बढ़ा। दूसरी ओर, BJP ने खुद को एक मजबूत विकल्प के रूप में पेश किया।
2026 के चुनाव में जो रुझान सामने आए, उन्होंने राजनीति की दिशा बदलने के संकेत दिए। BJP ने बड़ी बढ़त बनाई, जबकि TMC पिछड़ती नजर आई। यह बदलाव केवल चुनावी आंकड़ों का नहीं, बल्कि जनमत के बदलते रुझान का प्रतीक है।
मुद्दे जो बने निर्णायक
इस चुनाव में कई मुद्दे निर्णायक साबित हुए—
- बेरोजगारी और उद्योगों की कमी
- भ्रष्टाचार के आरोप
- युवाओं का पलायन
- महिलाओं के वोट में बदलाव
हालांकि ममता सरकार की ‘लक्ष्मी भंडार’ जैसी योजनाएं लोकप्रिय रहीं, लेकिन BJP के आर्थिक वादों और संगठनात्मक मजबूती ने मुकाबले को बदल दिया।
‘राजपथ की राजनीति’ का नया दौर
बंगाल की राजनीति में यह पहली बार हो सकता है कि केंद्र और राज्य—दोनों जगह एक ही पार्टी का वर्चस्व स्थापित हो। अगर ऐसा होता है, तो यह केवल सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि ‘राजपथ की राजनीति’ के चरित्र में भी बदलाव होगा।
ममता बनर्जी का राजनीतिक जीवन संघर्ष, साहस और जनसमर्थन की मिसाल रहा है। लेकिन 2026 का चुनाव यह सवाल खड़ा कर रहा है कि क्या वही जनता, जिसने उन्हें सत्ता तक पहुंचाया, अब बदलाव चाहती है?
बंगाल की राजनीति एक निर्णायक मोड़ पर है—जहां एक युग का अंत और दूसरे युग की शुरुआत संभव दिख रही है। आने वाले समय में यह स्पष्ट होगा कि क्या ममता बनर्जी इस चुनौती से उबरकर फिर से अपनी पकड़ मजबूत कर पाती हैं, या फिर राज्य की राजनीति एक नए अध्याय में प्रवेश कर चुकी है।

