लेखक: अज़हर उमरी
(वरिष्ठ पत्रकार)
कभी हिंदी फ़िल्में सिर्फ़ कहानी और अभिनय के लिए नहीं, बल्कि अपने संगीत के लिए भी जानी जाती थीं। ऐसा लगता था मानो फ़िल्में गीतों के सहारे ज़िंदा हैं और गीत फ़िल्मों की आत्मा हैं। लेकिन आज के दौर में यह कहने में कोई हिचक नहीं कि फ़िल्मों से अच्छे संगीत का दौर लगभग समाप्त हो चुका है।
जब गीत आत्मा हुआ करते थे
एक समय था जब फ़िल्म के गीत रिलीज़ से पहले ही लोगों की ज़ुबान पर चढ़ जाते थे। मोहम्मद रफ़ी, लता मंगेशकर, किशोर कुमार, मुकेश, आशा भोंसले जैसे गायकों की आवाज़, और शंकर–जयकिशन, एस.डी. बर्मन, मदन मोहन, नौशाद, आर.डी. बर्मन जैसे संगीतकारों की धुनें आज भी ज़िंदा हैं।
उन गीतों में शायरी होती थी, ठहराव होता था और एहसास की गहराई होती थी।
आज का संगीत: शोर ज़्यादा, सुर कम
आज फ़िल्मी संगीत तेज़ बीट्स, रीमिक्स और इलेक्ट्रॉनिक शोर तक सिमट गया है। गीतों में न तो साहित्यिक सौंदर्य बचा है और न ही सुरों की मिठास। अधिकतर गाने एक-दो हफ्तों में हिट और फिर भुला दिए जाते हैं।
जहां पहले गीत दिल में उतरते थे, वहीं आज के गाने सिर्फ़ कानों तक सीमित रह गए हैं।
रीमिक्स संस्कृति का असर
पुराने, कालजयी गीतों को बार-बार रीमिक्स करके पेश करना इस बात का संकेत है कि नए मौलिक संगीत की कमी हो गई है। रीमिक्स कभी-कभी मनोरंजन दे सकता है, लेकिन जब वही मुख्यधारा बन जाए, तो यह रचनात्मक दिवालियापन का संकेत होता है।
गीतकार और संगीतकार हाशिये पर
आज फ़िल्मों में सबसे कम अहमियत गीतकार को दी जाती है। शब्दों की जगह तुकबंदी ने ले ली है और भावनाओं की जगह बाज़ार ने। संगीत अब कला नहीं, बल्कि मार्केटिंग प्रोडक्ट बनता जा रहा है।
क्यों ज़रूरी है अच्छे संगीत की वापसी
संगीत सिर्फ़ मनोरंजन नहीं, बल्कि संस्कृति और संवेदनशीलता का आईना होता है। अच्छा गीत इंसान को सोचने, महसूस करने और खुद से जोड़ने का मौका देता है। जब फ़िल्मों से अच्छा संगीत गायब होता है, तो समाज की संवेदनशीलता भी धीरे-धीरे कम होने लगती है।
यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि हिंदी फ़िल्मों में अच्छे संगीत का स्वर्णिम दौर पीछे छूट चुका है। हालांकि उम्मीद अभी भी बाकी है। अगर निर्माता, निर्देशक और संगीतकार बाज़ार से ऊपर कला को रखें, तो शायद फिर कोई गीत ऐसा आए जो सालों बाद भी गुनगुनाया जाए।
संगीत जब तक दिल से पैदा होगा, तभी दिल तक पहुंचेगा।

