लेखक: तबस्सुम अब्बास
(सामाजिक चिंतक, अध्यापिका)
आज का दौर तकनीक का है, इसमें कोई दो राय नहीं। मोबाइल फोन, टैबलेट और इंटरनेट ने जीवन को सुविधाजनक बनाया है, लेकिन जब यही तकनीक १० वर्ष से कम उम्र के बच्चों की दिनचर्या का हिस्सा बन जाए, तो यह सुविधा नहीं बल्कि चिंता का विषय बन जाती है। एक अध्यापिका और सामाजिक चिंतक होने के नाते मैं यह महसूस करती हूँ कि छोटे बच्चों को मोबाइल से दूर रखना आज समय की सबसे बड़ी ज़रूरत बन चुका है।
बचपन का स्वाभाविक विकास और मोबाइल
१० साल से कम उम्र का समय बच्चे के मानसिक, शारीरिक और भावनात्मक विकास का सबसे महत्वपूर्ण चरण होता है। इस उम्र में बच्चों को खेल, किताबें, बातचीत, चित्र बनाना और प्रकृति से जुड़ाव चाहिए। मोबाइल स्क्रीन पर घंटों बिताने से बच्चों की एकाग्रता, कल्पनाशक्ति और सीखने की क्षमता प्रभावित होती है।
लगातार स्क्रीन देखने से आंखों पर बुरा असर, चिड़चिड़ापन, नींद की कमी और व्यवहार में आक्रामकता जैसी समस्याएँ भी सामने आ रही हैं।
माता-पिता की मजबूरी या लापरवाही
अक्सर देखा जाता है कि माता-पिता बच्चों को व्यस्त रखने के लिए मोबाइल थमा देते हैं। यह एक आसान उपाय ज़रूर है, लेकिन इसके दीर्घकालिक नुकसान बहुत गंभीर हैं। मोबाइल बच्चों के लिए आया या दोस्त नहीं बन सकता। उन्हें माता-पिता का समय, स्नेह और मार्गदर्शन चाहिए।
अध्यापकों की भी अहम भूमिका
आजकल कई स्कूलों में व्हाट्सएप या अन्य मोबाइल ऐप्स पर होमवर्क देना आम हो गया है। इससे अनजाने में बच्चों को मोबाइल के और करीब धकेला जा रहा है। मेरा मानना है कि
- १० साल से कम उम्र के बच्चों के लिए होमवर्क कक्षा में लिखवाया जाए
- अभिभावकों से संवाद के लिए मोबाइल का उपयोग हो, लेकिन बच्चों को सीधे इससे न जोड़ा जाए
- पढ़ाई का माध्यम किताब, कॉपी और शिक्षक की बातचीत ही रहे
मोबाइल नहीं, संस्कार दीजिए
बच्चों को मोबाइल देने के बजाय
- कहानी सुनाइए
- उनके साथ खेलिए
- सवाल पूछने और सोचने के लिए प्रेरित कीजिए
- किताबों से दोस्ती कराइए
यही आदतें उन्हें एक संवेदनशील, समझदार और संतुलित इंसान बनाएंगी।
मोबाइल तकनीक बुरी नहीं है, लेकिन गलत उम्र में और गलत तरीके से इस्तेमाल बच्चों के भविष्य के लिए घातक हो सकता है। माता-पिता और अध्यापक—दोनों की साझा ज़िम्मेदारी है कि वे बच्चों को मोबाइल नहीं, बल्कि ज्ञान, संस्कार और सुरक्षित बचपन दें।
आइए, बच्चों का बचपन मोबाइल की स्क्रीन नहीं, खुली आंखों और खुले मन से देखने दें।

