हज़रत उम्मुल मोमिनीन सैय्यदा ख़दीजा तुल कुबरा (रज़ियल्लाहु अन्हा)
इस्लामी इतिहास में 10 रमज़ान का दिन बेहद अहम् और दर्द भरी याद लेकर आता है। यही वह तारीख़ है जब Khadija bint Khuwaylid — जिन्हें हम सैय्यदा ख़दीजा तुल कुबरा (रज़ियल्लाहु अन्हा) के नाम से जानते हैं — का विसाल हुआ। आप सिर्फ़ रसूलुल्लाह ﷺ की पहली पत्नी ही नहीं थीं, बल्कि इस्लाम की पहली मानने वाली, पहली मददगार और सबसे बड़ी सहारा भी थीं।
पहली ईमान लाने वाली हस्ती
जब Muhammad ﷺ पर पहली वह़ी नाज़िल हुई और आप ग़ारे हिरा से लौटे, तो सबसे पहले सैय्यदा ख़दीजा (रज़ि.) ने ही आप पर ईमान लाया। उस कठिन घड़ी में उन्होंने न सिर्फ़ दिलासा दिया बल्कि यह यक़ीन दिलाया कि अल्लाह तआला कभी आपको रुसवा नहीं करेगा। उनका यह यक़ीन, उनकी दूरअंदेशी और उनका सच्चा भरोसा इस्लाम की बुनियाद को मज़बूती देने वाला साबित हुआ।
कुर्बानी और सहयोग की मिसाल
मक्का के दौर-ए-सितम में जब मुसलमानों का सामाजिक और आर्थिक बहिष्कार किया गया, तब सैय्यदा ख़दीजा (रज़ि.) ने अपना सारा माल इस्लाम और मुसलमानों की मदद में खर्च कर दिया। तीन साल का कठिन शिब-ए-अबी तालिब का दौर उनकी सब्र, त्याग और अटूट विश्वास का जीता-जागता प्रमाण है।
वह एक सफल और सम्मानित व्यवसायी थीं, लेकिन इस्लाम की खातिर उन्होंने अपनी सारी दौलत कुर्बान कर दी। यही वजह है कि उन्हें “उम्मुल मोमिनीन” (ईमान वालों की माँ) का मुकद्दस दर्जा हासिल हुआ।
अल्लाह की खास बशारत
हदीसों में आता है कि अल्लाह तआला ने जिब्रील (अलैहिस्सलाम) के ज़रिये सैय्यदा ख़दीजा (रज़ि.) को जन्नत में एक ऐसे महल की खुशखबरी दी, जिसमें न कोई शोर होगा और न कोई तकलीफ़। यह उनके सब्र और खिदमत का अनोखा इनाम था।
आमुल हुज़्न – ग़म का साल
10 रमज़ान को उनका विसाल हुआ। उसी साल चंद महीनों बाद हज़रत अबू तालिब का भी इंतक़ाल हुआ। इस तरह वह साल “आमुल हुज़्न” (ग़म का साल) कहलाया, क्योंकि रसूलुल्लाह ﷺ को अपने दो सबसे बड़े सहारों से जुदाई सहनी पड़ी।
हमारी सीख
सैय्यदा ख़दीजा (रज़ियल्लाहु अन्हा) की ज़िंदगी हमें यह सिखाती है कि:
सच्चा साथ मुश्किल हालात में दिया जाता है।
दौलत और ताक़त का असली मक़सद भलाई और दीन की खिदमत है।
एक नेक और समझदार पत्नी पूरे समाज की तामीर में अहम किरदार अदा कर सकती है।
10 रमज़ान का दिन हमें उनकी कुर्बानियों, उनके सब्र और उनके अटूट ईमान को याद दिलाता है। अल्लाह तआला हमें भी उनके नक्श-ए-कदम पर चलने की तौफ़ीक़ अता फरमाए।

