इस्लामी इतिहास में ज़िलहिज्जा का महीना कुर्बानी, त्याग और इबादत का पैग़ाम लेकर आता है। इसी महीने में Imam Hussain का वह ऐतिहासिक सफ़र भी जारी था, जिसने आगे चलकर इंसानियत को कर्बला जैसा अमर संदेश दिया।
11 ज़िलहिज्जा 60 हिजरी को इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम का क़ाफ़िला मक्का मुकर्रमा से निकलकर इराक़ की ओर बढ़ रहा था। आपने 8 ज़िलहिज्जा को हज को उमरा में बदलकर मक्का से रवाना होने का फैसला किया था, क्योंकि यज़ीद की बैअत के लिए दबाव बढ़ चुका था और हरम-ए-काबा में खून-खराबे का खतरा था।
इमाम हुसैन का यह सफ़र केवल एक यात्रा नहीं था, बल्कि हक़, इंसाफ़ और दीन-ए-इस्लाम की हिफाज़त के लिए उठाया गया ऐतिहासिक कदम था। 11 ज़िलहिज्जा तक क़ाफ़िला हिजाज़ के कई इलाक़ों को पार कर चुका था और इराक़ की राह में लगातार आगे बढ़ रहा था। रास्ते में विभिन्न क़बीलों और मुसाफ़िरों से मुलाक़ातें हो रही थीं, जो कूफ़ा के बदलते हालात की खबरें दे रहे थे।
कूफ़ा के लोगों ने पहले हजारों खत लिखकर इमाम हुसैन को बुलाया था, लेकिन धीरे-धीरे वहां का माहौल बदलने लगा। यज़ीद के गवर्नर ने डर और दबाव का माहौल बना दिया था। हालांकि उस समय तक Muslim ibn Aqil की शहादत की खबर पूरी तरह क़ाफ़िले तक नहीं पहुँची थी, लेकिन हालात की गंभीरता महसूस होने लगी थी।
इतिहास गवाह है कि इमाम हुसैन ने हर मोड़ पर सब्र, हिम्मत और अल्लाह पर भरोसे का दामन थामे रखा। उन्होंने सत्ता या दुनिया के लिए नहीं, बल्कि उम्मत को सच्चाई और इंसाफ़ का रास्ता दिखाने के लिए यह सफ़र जारी रखा।
आगे चलकर यही क़ाफ़िला मैदान-ए-कर्बला पहुँचा, जहां Battle of Karbala में इमाम हुसैन और उनके साथियों ने अपनी जानें कुर्बान कर दीं, लेकिन जुल्म और अत्याचार के सामने सिर नहीं झुकाया।
11 ज़िलहिज्जा का यह दिन हमें याद दिलाता है कि सच्चाई का रास्ता कठिन जरूर होता है, लेकिन वही रास्ता इंसान को अमर बना देता है। इमाम हुसैन का सफ़र आज भी पूरी दुनिया को सब्र, कुर्बानी और इंसाफ़ का पैग़ाम देता है।
लेखक – अज़हर उमरी

