आगरा। मस्जिद नहर वाली के खतीब मुहम्मद इकबाल ने शुक्रवार की नमाज के दौरान अपने संबोधन में नमाजियों को आखिरत की याद दिलाते हुए दुनिया की हकीकत, इंसानी घमंड और गफलत पर प्रभावी ढंग से प्रकाश डाला।
उन्होंने एक जनाजे में शामिल व्यक्ति का वाकया सुनाते हुए बताया कि दफन के दौरान कब्रिस्तान में एक कब्र पर लिखा देखा—“मैं महत्वपूर्ण था, यही मेरा वहम था।” इस वाक्य को पढ़कर कुछ देर के लिए उनके कदम रुक गए।
मुहम्मद इकबाल ने कहा कि इंसान दुनिया में पद, धन, प्रतिष्ठा और फॉलोअर्स के कारण खुद को महत्वपूर्ण समझने लगता है, जबकि मृत्यु के बाद उसे अपनी वास्तविकता का एहसास होता है। कुरआन हमें याद दिलाता है कि दुनिया की जिंदगी खेल, तमाशा, सजावट और एक-दूसरे पर गर्व करने की होड़ है।
उन्होंने कहा कि इंसान को धन-दौलत और प्रतिष्ठा की अधिक चाहत अक्सर गफलत में डाल देती है और वह आखिरत को भूल जाता है। कब्र में न पद काम आएगा, न दौलत और न ही प्रसिद्धि—वहां इंसान के काम उसके अच्छे कर्म और तकवा आएंगे।
उन्होंने कहा कि हम अक्सर यह सोचते हैं कि हमारे बिना कार्यालय, दुकान, फैक्ट्री या संस्था नहीं चल सकती, लेकिन हकीकत यह है कि हमारे कब्र में जाने के बाद भी दुनिया उसी तरह चलती रहती है।
खतीब मुहम्मद इकबाल ने कहा, “महत्वपूर्ण वह नहीं जो लोगों के बीच मशहूर हो, बल्कि महत्वपूर्ण वह है जो अल्लाह के यहां स्वीकार्य हो।” उन्होंने पैगंबर-ए-इस्लाम हजरत मुहम्मद ﷺ की हदीस का हवाला देते हुए कहा कि अल्लाह इंसान की शक्ल-सूरत और माल को नहीं, बल्कि उसके दिल और उसके कर्मों को देखता है।
उन्होंने नमाजियों से अपील की कि दुनिया की गफलत और झूठी श्रेष्ठता के भ्रम में जीने के बजाय अल्लाह की रजा, तकवा और नेक अमल हासिल करने की कोशिश करें। यही वास्तविक सफलता का रास्ता है।
