22 अक्टूबर को जयंती, 19 दिसंबर को शहादत दिवस—काकोरी के अमर क्रांतिकारी की प्रतिमा पर फूलों के बजाय परिंदों का पहरा; शहीदों को याद करने के हमारे तरीकों पर गंभीर सवाल
आगरा। आज 22 अक्टूबर है। यह वह तारीख है, जब 1900 में एक ऐसे क्रांतिकारी ने जन्म लिया था, जिसने देश की आज़ादी के लिए अपनी जिंदगी कुर्बान कर दी। उनका नाम था शहीद अशफ़ाक़ उल्ला ख़ाँ। वह काकोरी कांड के उन अमर नायकों में शामिल थे, जिन्होंने अंग्रेज़ी हुकूमत की नींव हिलाने का साहस दिखाया और मातृभूमि की आज़ादी के लिए हंसते-हंसते फांसी के फंदे को चूम लिया।
लेकिन अफसोस! आगरा में प्रतापपुरा के पास मौजूद इस महान क्रांतिकारी की प्रतिमा आज भी अपनों के इंतज़ार में खड़ी है। जयंती के दिन जहां उनकी प्रतिमा पर फूलों की मालाएं होनी चाहिए थीं, जहां देशभक्ति के तराने गूंजने चाहिए थे और जहां नई पीढ़ी को उनके बलिदान की कहानी सुनाई जानी चाहिए थी, वहां खामोशी नजर आती है। प्रतिमा के आसपास मंडराते परिंदे मानो उनका स्वागत कर रहे हों, जबकि इंसानी दुनिया अपनी व्यस्तताओं में उलझी हुई है।
क्या यही वह सम्मान है, जिसके हकदार हमारे स्वतंत्रता सेनानी हैं?
शहादत की तारीख याद है, मगर शहीदों की विरासत कितनी याद है?
शहीद अशफ़ाक़ उल्ला ख़ाँ का जन्म 22 अक्टूबर 1900 को हुआ था। 19 दिसंबर 1927 को उन्हें फैजाबाद जेल में फांसी दी गई। उनका जीवन इस बात की मिसाल है कि देश की आज़ादी का सपना किसी एक धर्म, जाति या समुदाय का सपना नहीं था। यह पूरे हिंदुस्तान की साझा आकांक्षा थी।
अशफ़ाक़ उल्ला ख़ाँ और राम प्रसाद बिस्मिल की दोस्ती भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास का ऐसा अध्याय है, जो आज भी हमें आपसी प्रेम, भरोसे और एकता का संदेश देता है। दोनों ने अलग-अलग धार्मिक पृष्ठभूमि से आने के बावजूद एक ही लक्ष्य के लिए संघर्ष किया—भारत की आज़ादी।
उनकी शहादत हमें याद दिलाती है कि देश की मिट्टी से मोहब्बत करने वालों के लिए मजहब की दीवारें कभी उनके कर्तव्य से बड़ी नहीं थीं।
फिर सवाल उठता है कि जिस देश की आज़ादी के लिए अशफ़ाक़ उल्ला ख़ाँ ने अपना सब कुछ न्योछावर कर दिया, उसी देश में उनकी जयंती पर उनकी प्रतिमा के पास सन्नाटा क्यों है? क्या शहीदों को याद करना केवल राष्ट्रीय पर्वों की औपचारिकता बनकर रह गया है?
15 अगस्त और 26 जनवरी को ही क्यों याद आते हैं शहीद?
आगरा जैसे ऐतिहासिक शहर में, जहां शिक्षा के अनेक संस्थान हैं और हजारों बच्चे हर दिन स्कूलों में अपने भविष्य की तैयारी करते हैं, वहां शहीदों की विरासत को जीवित रखने की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है।
स्थानीय स्तर पर यह शिकायत सामने आती है कि प्रतापपुरा के पास स्थित शहीद अशफ़ाक़ उल्ला ख़ाँ की प्रतिमा को याद करने की गतिविधियां मुख्य रूप से 15 अगस्त और 26 जनवरी जैसे अवसरों तक सीमित रह जाती हैं। यदि ऐसा है, तो यह हम सभी के लिए आत्ममंथन का विषय है।
स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस पर प्रतिमाओं पर माल्यार्पण करना अच्छी परंपरा है, लेकिन क्या शहीदों के प्रति हमारी जिम्मेदारी केवल इन दो दिनों तक ही सीमित होनी चाहिए? क्या उनके जन्मदिन और शहादत दिवस पर उन्हें याद करना, उनके विचारों को समझना और नई पीढ़ी को उनके संघर्ष से परिचित कराना हमारी प्राथमिकता नहीं होनी चाहिए?
शहीदों का सम्मान केवल फूल चढ़ाने से नहीं, बल्कि उनके विचारों को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने से पूरा होता है।
शहर के स्कूलों से एक सवाल
आगरा में बड़ी संख्या में स्कूल हैं। यहां पढ़ने वाले बच्चों को इतिहास, स्वतंत्रता आंदोलन और देश के महान क्रांतिकारियों के बारे में बताया जाता है। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या शहीद अशफ़ाक़ उल्ला ख़ाँ की जयंती पर स्कूलों में विशेष कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं? क्या बच्चों को काकोरी कांड और अशफ़ाक़-बिस्मिल की दोस्ती के बारे में बताया जाता है? क्या उन्हें उस क्रांतिकारी की प्रतिमा तक ले जाया जाता है, जिसने देश के लिए अपनी जान दे दी?
यदि शहर के स्कूल इस दिशा में पहल करें, तो अशफ़ाक़ उल्ला ख़ाँ की जयंती केवल कैलेंडर की एक तारीख नहीं रहेगी। यह बच्चों के लिए इतिहास को समझने, सांप्रदायिक सद्भाव सीखने और देश के प्रति अपने कर्तव्यों को पहचानने का अवसर बन सकती है।
स्कूलों में निबंध प्रतियोगिताएं, भाषण, देशभक्ति के कार्यक्रम और स्वतंत्रता सेनानियों के जीवन पर चर्चा आयोजित की जा सकती है। स्थानीय प्रशासन, सामाजिक संस्थाएं और नागरिक संगठन मिलकर प्रतिमा स्थल पर स्वच्छता, उचित रखरखाव और नियमित स्मरण कार्यक्रम सुनिश्चित कर सकते हैं।
काश! शहीद की रूह हमसे पूछ सके…
कल्पना कीजिए, अगर शहीद अशफ़ाक़ उल्ला ख़ाँ आज हमसे सवाल कर पाते, तो शायद पूछते—मैंने जिस मुल्क की आज़ादी के लिए अपनी जिंदगी कुर्बान की, क्या उस मुल्क के लोगों ने मुझे अपनी यादों में जगह दी? क्या मेरी शहादत का मकसद सिर्फ इतना था कि साल में दो दिन मेरी प्रतिमा पर फूल चढ़ा दिए जाएं? क्या मेरी दोस्ती, मेरा संघर्ष और मेरा बलिदान नई पीढ़ी तक पहुंचा?
ये सवाल किसी एक संगठन, एक स्कूल, एक समुदाय या एक राजनीतिक दल से नहीं, बल्कि पूरे शहर और समाज से हैं।
शहीदों की कुर्बानी पर गर्व करना आसान है, मगर उनकी विरासत को संभालना हमारी जिम्मेदारी है। उनकी प्रतिमा की देखभाल, उनके नाम से शैक्षिक गतिविधियां और उनके विचारों का प्रचार-प्रसार किसी पर एहसान नहीं, बल्कि उस इतिहास के प्रति हमारा कर्तव्य है, जिसकी बदौलत आज हम आजाद देश में सांस ले रहे हैं।
अब वक्त है खामोशी तोड़ने का
आगरा के जनप्रतिनिधियों, प्रशासन, शिक्षण संस्थानों, सामाजिक संगठनों और जागरूक नागरिकों से अपील है कि शहीद अशफ़ाक़ उल्ला ख़ाँ की प्रतिमा की स्थिति पर ध्यान दिया जाए। उनकी जयंती और शहादत दिवस पर नियमित कार्यक्रम आयोजित हों। स्कूलों के बच्चों को उनके जीवन से परिचित कराया जाए और प्रतिमा स्थल को सम्मानजनक, स्वच्छ तथा सुव्यवस्थित रखा जाए।
आइए, इस 22 अक्टूबर को केवल एक जयंती के रूप में न देखें। इसे अपने इतिहास से रिश्ता मजबूत करने का दिन बनाएं। प्रतिमा के पास से गुजरते समय एक पल ठहरें, उस नाम को पढ़ें और याद करें कि हमारी आजादी के पीछे कितने नौजवानों के सपने, संघर्ष और कुर्बानियां छिपी हैं।
प्रतापपुरा के पास खड़ी शहीद अशफ़ाक़ उल्ला ख़ाँ की प्रतिमा आज भी अपने लोगों का इंतज़ार कर रही है। सवाल यह है कि हम कब पहुंचेंगे—सिर्फ फूल लेकर, या उनके विचारों को अपनी जिंदगी में उतारने का संकल्प लेकर भी?
शहीद अशफ़ाक़ उल्ला ख़ाँ को उनकी जयंती पर सादर नमन। उनकी शहादत, उनकी दोस्ती और उनका देशप्रेम आने वाली पीढ़ियों को हमेशा प्रेरणा देते रहें।
— अज़हर उमरी, वरिष्ठ पत्रकार
