लेखक। अज़हर उमरी
इस्लामी तारीख़ में 24 रजब का दिन एक ख़ास अहमियत रखता है। यही वह मुबारक दिन है जब अल्लाह तआला ने मुसलमानों को फ़तेह-ए-ख़ैबर जैसी अज़ीम और फ़ैसला-कुन कामयाबी अता फ़रमाई। यह फ़तह सिर्फ़ एक जंग की जीत नहीं थी, बल्कि ज़ुल्म, धोखे और साज़िशों के ख़िलाफ़ हक़, सच्चाई और इंसाफ़ की जीत थी।
ख़ैबर का पस-ए-मंज़र
ख़ैबर मदीना मुनव्वरा से उत्तर की जानिब एक इलाक़ा था, जहाँ यहूदी क़बीलों के मज़बूत और ऊँचे क़िले मौजूद थे। यही क़िले मुसलमानों के ख़िलाफ़ साज़िशों का मरकज़ बने हुए थे। मदीना की इस्लामी रियासत को नुक़सान पहुँचाने के लिए यहाँ से बार-बार दुश्मनियों की योजना बनाई जाती थी। ऐसे हालात में रसूल-ए-अकरम ﷺ ने अमन और सलामती की ख़ातिर ख़ैबर की तरफ़ कूच फ़रमाया।
रसूल ﷺ की क़ियादत और सहाबाؓ की कुर्बानियाँ
7 हिजरी में यह मुहिम शुरू हुई। मुसलमान तादाद में कम थे, मगर ईमान में बुलंद। रसूल-ए-अकरम ﷺ ने जंग के दौरान सब्र, हिकमत और इंसाफ़ की आला मिसाल क़ायम की। कई क़िले फ़तह हुए, लेकिन आख़िरी और सबसे मज़बूत क़िला अब भी बाक़ी था।
हज़रत अलीؓ और फ़तेह का लम्हा
इसी मौक़े पर नबी-ए-करीम ﷺ का वह मशहूर फ़रमान सामने आया जिसने तारीख़ का रुख़ बदल दिया:
“कल मैं झंडा उस शख़्स को दूँगा जो अल्लाह और उसके रसूल से मोहब्बत करता है और अल्लाह और उसका रसूल उससे मोहब्बत करते हैं।”
अगले दिन यह झंडा हज़रत अली कर्रमल्लाहु वज्हहू को अता किया गया। अल्लाह के फ़ज़्ल से हज़रत अलीؓ ने बे-मिसाल शुजाअत दिखाते हुए ख़ैबर का मज़बूत क़िला फ़तह कर लिया। यही वह लम्हा था जिसने 24 रजब को तारीख़-ए-इस्लाम में हमेशा के लिए अमर बना दिया।
फ़तेह-ए-ख़ैबर का पैग़ाम
फ़तेह-ए-ख़ैबर हमें कई अहम सबक़ सिखाती है:
जीत तादाद और हथियार से नहीं, ईमान और यक़ीन से मिलती है।
इस्लाम ज़ुल्म नहीं, इंसाफ़ और अमन का दीन है।
सच्चा मोमिन मुश्किल हालात में भी सब्र और हिम्मत नहीं छोड़ता।
क़ियादत वही कामयाब होती है जो इंसाफ़, अख़लाक़ और रहमत पर क़ायम हो।
आज के दौर में 24 रजब की अहमियत
आज जब दुनिया ज़ुल्म, नफ़रत और नाइंसाफ़ी से जूझ रही है, 24 रजब हमें याद दिलाता है कि हक़ आख़िरकार ग़ालिब आता है। यह दिन हमें हज़रत अलीؓ की शुजाअत, रसूल ﷺ की रहमत-ए-आलमीन सिफ़त और सहाबाؓ की कुर्बानियों से रहनुमाई हासिल करने का पैग़ाम देता है।
24 रजब — यौम-ए-फ़तेह-ए-ख़ैबर सिर्फ़ एक तारीखी दिन नहीं, बल्कि ईमान की ताज़गी, इंसाफ़ की तजदीद और हक़ पर डटे रहने का अहद है।
यौम-ए-फ़तेह-ए-ख़ैबर मुबारक।
अल्लाह तआला हमें हक़ को पहचानने, उस पर अमल करने और ज़ुल्म के ख़िलाफ़ डटकर खड़े होने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए। आमीन।

