बुलंदशहर। आमतौर पर कहा जाता है कि ताजमहल बनाने के लिए मुमताज और संगमरमर चाहिए, लेकिन बुलंदशहर जिले के कसेर कलां गांव में एक साधारण डाकिया ने यह साबित कर दिया कि ताजमहल बनाने के लिए सिर्फ बेपनाह मोहब्बत काफी होती है। यह कहानी है रिटायर्ड पोस्टमास्टर फैजुल और उनकी पत्नी तजमुल्ली बेगम की, जिनकी मोहब्बत आज ‘छोटे ताजमहल’ के रूप में अमर हो गई है।
अधूरा सपना बना ज़िंदगी का मकसद
तजमुल्ली बेगम की ख्वाहिश थी कि उनके बाद भी कोई ऐसी निशानी रहे, जो उनकी मौजूदगी का एहसास कराती रहे। वर्ष 2011 में कैंसर से तजमुल्ली बेगम के इंतकाल के बाद फैजुल ने ग़म में टूटने के बजाय उनकी उस ख्वाहिश को अपनी ज़िंदगी का मकसद बना लिया।
पेंशन, ज़मीन और गहने—सब मोहब्बत के नाम
एक रिटायर्ड पोस्टमास्टर की सीमित आमदनी के बावजूद फैजुल ने पीछे मुड़कर नहीं देखा।
उन्होंने अपनी पेंशन, जमा-पूंजी, ज़मीन और गहने तक बेच दिए और करीब 14 लाख रुपये खर्च कर पत्नी की याद में यह मकबरा तामीर कराया।
जब सरकारी मदद की पेशकश हुई तो उन्होंने उसे यह कहकर ठुकरा दिया—
“यह मेरी निजी मोहब्बत है, इसे मैं अपनी कमाई से ही पूरा करूँगा।”
सरकार से मिली सहायता राशि उन्होंने बच्चियों की शिक्षा के लिए दान कर दी।
सादगी में बसी मोहब्बत
यह ‘छोटा ताजमहल’ भले ही संगमरमर से न चमकता हो, लेकिन इसकी हर ईंट में वफादारी और इश्क़ की खुशबू रची-बसी है। यह इमारत दिखावे की नहीं, जज़्बात की मिसाल है।
मोहब्बत से निकला शिक्षा का उजाला
फैजुल की ज़िद और सोच का नतीजा यह रहा कि आज उसी परिसर में लड़कियों का इंटर कॉलेज संचालित हो रहा है। यह साबित करता है कि सच्चा प्यार सिर्फ यादगारें नहीं बनाता, बल्कि आने वाली पीढ़ियों का भविष्य भी संवारता है।
मौत भी न कर सकी जुदा
फैजुल की वसीयत के मुताबिक, आज वे अपनी पत्नी तजमुल्ली बेगम के बगल में ही सुपुर्द-ए-ख़ाक हैं। मौत उन्हें जुदा करने आई थी, लेकिन इस मकबरे ने उन्हें हमेशा के लिए एक कर दिया।
मोहब्बत की अमर मिसाल
कसेर कलां गांव का यह ‘छोटा ताजमहल’ आज सिर्फ एक इमारत नहीं, बल्कि उस बेनाम डाकिया की कहानी है, जिसने दौलत नहीं, जज़्बात से इतिहास रच दिया।
वाकई, वक्त के पास वो स्याही नहीं जो इस मोहब्बत को मिटा सके—
यह वो ताजमहल है जिसे बादशाहत ने नहीं, एक आम इंसान के इश्क़ ने बनाया है।

