लेखक। अज़हर उमरी
20 रमज़ान का दिन इस्लामी इतिहास में बेहद दर्दनाक और भावुक दिन के रूप में याद किया जाता है। यह वह समय था जब इस्लाम के चौथे ख़लीफ़ा, शेर-ए-ख़ुदा Ali ibn Abi Talib ज़ख़्मी हालत में अपनी ज़िंदगी के आख़िरी लम्हे गुज़ार रहे थे।
19 रमज़ान को फ़ज्र की नमाज़ के दौरान Abd al-Rahman ibn Muljam ने कूफ़ा की मस्जिद में ज़हर बुझी तलवार से वार किया था। इस हमले के बाद मौला अली गंभीर रूप से घायल हो गए और 19 से 21 रमज़ान तक उनकी तबीयत लगातार नाज़ुक बनी रही।
मौला अली की सेहत
20 रमज़ान तक मौला अली की हालत बहुत कमज़ोर हो चुकी थी। ज़हर का असर पूरे जिस्म में फैल चुका था। घर में उनके बेटे Hasan ibn Ali और Husayn ibn Ali समेत अहले-बैत के लोग मौजूद थे। वे अपने पिता की सेवा में लगे हुए थे और उनकी बातें ध्यान से सुन रहे थे।
मौला अली इस हालत में भी सब्र, इंसाफ़ और इंसानियत का पैग़ाम दे रहे थे। उन्होंने अपने बेटों और उम्मत को ऐसी नसीहतें दीं जो आज भी पूरी दुनिया के लिए मार्गदर्शन हैं।
मौला अली का आख़िरी पैग़ाम
मौला अली ने अपने बेटों और मुसलमानों को यह महत्वपूर्ण संदेश दिया:
अल्लाह से डरते रहो और नमाज़ को कभी मत छोड़ो।
यतीमों का ख़ास ख़याल रखना और गरीबों की मदद करना।
ज़ुल्म और नाइंसाफ़ी से हमेशा दूर रहना।
कुरआन को अपनी ज़िंदगी का रास्ता बनाना।
आपस में एकता और भाईचारा बनाए रखना।
उन्होंने यह भी कहा कि अगर उनके क़ातिल को सज़ा दी जाए तो इंसाफ़ के दायरे में दी जाए और ज़्यादती न की जाए। यह उनके उच्च चरित्र और न्यायप्रियता का सबसे बड़ा प्रमाण है।
इंसानियत के लिए संदेश
मौला अली की ज़िंदगी और उनके आख़िरी शब्द हमें यह सिखाते हैं कि इंसान को हर हाल में सच्चाई, न्याय और इंसानियत का रास्ता नहीं छोड़ना चाहिए।
20 रमज़ान का दिन हमें याद दिलाता है कि इस्लाम की असली शिक्षा इंसाफ़, सब्र, करुणा और भाईचारा है—जिसे मौला अली ने अपने जीवन और अंतिम क्षणों तक निभाया।

