लखनऊ। उत्तर प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनाव की सियासी बिसात बिछनी शुरू हो गई है। वर्ष 2027 में सत्ता परिवर्तन का सपना देख रही समाजवादी पार्टी ने इस बार अपनी रणनीति का केंद्र अनुसूचित जाति एवं जनजाति के लिए आरक्षित विधानसभा क्षेत्रों को बनाया है। पार्टी नेतृत्व का मानना है कि यदि इन सीटों पर संगठनात्मक पकड़ मजबूत कर ली जाए और पीडीए (पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक) सामाजिक गठजोड़ को और विस्तार दिया जाए, तो चुनावी मुकाबले में बढ़त हासिल की जा सकती है।
लोकसभा चुनाव 2024 में मिले सकारात्मक संकेतों से उत्साहित सपा अब उन विधानसभा क्षेत्रों पर विशेष ध्यान दे रही है, जहां दलित मतदाताओं की निर्णायक भूमिका है। इसी दिशा में पार्टी ने अपने युवा संगठनों को सक्रिय करते हुए जमीनी स्तर पर व्यापक फीडबैक जुटाया है। छात्र सभा, युवजन सभा और समाजवादी यूथ ब्रिगेड के माध्यम से अलग-अलग रिपोर्ट तैयार कराई गई हैं, जिनके आधार पर क्षेत्रवार राजनीतिक स्थिति का आकलन किया जा रहा है।
राजनीतिक सूत्रों के अनुसार, पार्टी ने खासतौर पर उन आरक्षित सीटों की पहचान की है जहां पिछले विधानसभा चुनाव में जीत-हार का अंतर कम रहा था या जहां हालिया लोकसभा चुनाव में मतदाताओं के रुझान में बदलाव देखने को मिला। इन क्षेत्रों में बूथ प्रबंधन, स्थानीय नेतृत्व, सामाजिक समीकरण और विपक्षी दलों की ताकत का विस्तृत अध्ययन किया गया है।
उत्तर प्रदेश की कुल 403 विधानसभा सीटों में 86 सीटें आरक्षित श्रेणी में आती हैं। बीते दो चुनावों में इन सीटों पर भाजपा का दबदबा रहा है, लेकिन सपा को विश्वास है कि लोकसभा चुनाव में उभरे नए सामाजिक समीकरण विधानसभा चुनाव में भी असर दिखा सकते हैं। पार्टी का मानना है कि दलित समुदाय के विभिन्न वर्गों में उसकी स्वीकार्यता पहले की तुलना में बढ़ी है और इसी आधार पर वह अपनी चुनावी रणनीति को आगे बढ़ा रही है।
सपा की नजर विशेष रूप से उन सामाजिक समूहों पर है जिन्हें परंपरागत रूप से बसपा और भाजपा के प्रभाव क्षेत्र का हिस्सा माना जाता रहा है। पार्टी संगठन इन वर्गों के बीच लगातार संवाद कार्यक्रम चला रहा है और स्थानीय स्तर पर नए नेतृत्व को भी आगे लाने की कोशिश की जा रही है।
बताया जाता है कि अधिकांश आरक्षित सीटों पर सर्वेक्षण और फीडबैक का काम पूरा हो चुका है। जहां अलग-अलग रिपोर्टों में विरोधाभास मिला, वहां दोबारा समीक्षा कराई गई। युवा मतदाताओं और पहली बार मतदान करने वाले वर्ग के रुझान को भी विशेष रूप से शामिल किया गया है, ताकि चुनावी रणनीति को अधिक प्रभावी बनाया जा सके।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सपा की यह कवायद केवल संगठनात्मक समीक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि उम्मीदवार चयन, बूथ प्रबंधन और क्षेत्रवार चुनाव अभियान की रूपरेखा तय करने की दिशा में भी महत्वपूर्ण कदम है। यदि पार्टी लोकसभा चुनाव में बने सामाजिक गठजोड़ को विधानसभा स्तर तक कायम रखने में सफल रहती है, तो 2027 का चुनाव उत्तर प्रदेश की राजनीति में बेहद दिलचस्प मुकाबले का गवाह बन सकता है।

