लेखक – अज़हर उमरी ( वरिष्ठ पत्रकार )
दुनिया भर में शेर को साहस, शक्ति और शौर्य का प्रतीक माना जाता है। “शेरदिल” जैसे शब्द इसी सोच को दर्शाते हैं। इतिहास में कई ऐसे वीरों का उल्लेख मिलता है जिन्हें शेर का सामना करने या उसे परास्त करने के कारण विशेष उपाधियाँ दी गईं। लेकिन समय के साथ यही शौर्य प्रदर्शन एक खतरनाक प्रवृत्ति में बदल गया—शिकार की होड़। शेर की खाल, उसके सिर और उससे जुड़ी कहानियाँ शान का प्रतीक बन गईं, और धीरे-धीरे यह शौक उसकी संख्या के लिए अभिशाप बन गया।
भारत, जो कभी घने जंगलों, बहती नदियों और विस्तृत पर्वत श्रृंखलाओं के कारण वन्यजीवों का स्वर्ग माना जाता था, शेरों का प्रमुख निवास स्थान था। यहाँ के जंगलों में शेर की दहाड़ गूंजती थी, जो प्रकृति की जीवंतता का प्रतीक थी। लेकिन 20वीं सदी के मध्य तक आते-आते यह दहाड़ धीमी पड़ने लगी। 1960 और 70 के दशक में जंगलों में एक अजीब-सी खामोशी छाने लगी—यह खामोशी शेरों के गायब होने की थी।
इस गिरावट के पीछे कई कारण थे। अंधाधुंध शिकार, जंगलों की कटाई, बढ़ती आबादी और विकास के नाम पर प्राकृतिक आवासों का विनाश—इन सबने मिलकर शेरों के अस्तित्व को संकट में डाल दिया। आज़ादी के बाद देश को आर्थिक और सामाजिक चुनौतियों का सामना करना पड़ा, जिसके चलते जंगलों को काटकर बसाहट और उद्योगों के लिए जगह बनाई गई। ऐसे में वन्यजीवों की सुरक्षा पीछे छूटती चली गई।
इसी कठिन समय में एक निर्णायक मोड़ आया। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने इस संकट को गंभीरता से समझा। उन्होंने महसूस किया कि यदि शेर को बचाना है, तो उसके पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को संरक्षित करना होगा। इसी सोच के साथ 1 अप्रैल 1973 को “प्रोजेक्ट टाइगर” की शुरुआत हुई।
यह परियोजना केवल एक सरकारी योजना नहीं थी, बल्कि एक राष्ट्रीय संकल्प था। शुरुआत में देश के सिर्फ नौ क्षेत्रों को टाइगर रिज़र्व के रूप में चुना गया। इन क्षेत्रों में “कोर ज़ोन” और “बफर ज़ोन” की अवधारणा लागू की गई, ताकि शेरों को सुरक्षित और निर्बाध वातावरण मिल सके। साथ ही, उनके शिकार बनने वाले जानवरों की संख्या बढ़ाने और जंगलों को पुनर्जीवित करने पर ध्यान दिया गया।
हालांकि, यह सफर आसान नहीं था। कई स्थानों पर जंगलों के पास बसे गाँवों को स्थानांतरित करना पड़ा, जो भावनात्मक और सामाजिक दृष्टि से बेहद चुनौतीपूर्ण था। लेकिन धीरे-धीरे लोगों की भागीदारी और वैज्ञानिक तरीकों के उपयोग से यह अभियान सफल होने लगा। कैमरा ट्रैप, डीएनए विश्लेषण और आधुनिक गणना तकनीकों ने शेरों की निगरानी को अधिक प्रभावी बनाया।
इस दौरान कुछ असफलताएँ भी सामने आईं। एक समय ऐसा आया जब कुछ टाइगर रिज़र्व में शेर पूरी तरह गायब हो गए, जिसने पूरे सिस्टम पर सवाल खड़े कर दिए। लेकिन इन घटनाओं से सीख लेकर सुरक्षा व्यवस्था को और मजबूत किया गया, और पुनर्वास के प्रयासों ने सकारात्मक परिणाम दिए।
आज स्थिति बिल्कुल बदल चुकी है। भारत दुनिया के लगभग 70 प्रतिशत जंगली शेरों का घर बन चुका है। 2023 की गणना के अनुसार देश में 3500 से अधिक शेर मौजूद हैं और 50 से अधिक टाइगर रिज़र्व सक्रिय हैं। यह केवल एक प्रजाति की वापसी नहीं, बल्कि पूरे पारिस्थितिकी तंत्र के पुनर्जीवन की कहानी है।
विशेषज्ञों के अनुसार, शेर एक “अम्ब्रेला स्पीशीज़” है—अर्थात उसकी सुरक्षा से अनेक अन्य जीव-जंतुओं और प्राकृतिक संसाधनों की भी रक्षा होती है। इसलिए प्रोजेक्ट टाइगर ने न केवल शेरों को बचाया, बल्कि जंगलों, नदियों और जैव विविधता को भी नई जिंदगी दी।
आज भी हर कोई शेर को अपनी आंखों से नहीं देख पाता, लेकिन उसकी मौजूदगी भारत के जंगलों में महसूस की जा सकती है। कभी-कभी सुबह की खामोशी में, जब आप किसी जंगल के किनारे खड़े होते हैं, तो दूर से आती उसकी दहाड़ सिर्फ एक जानवर की आवाज़ नहीं होती—वह एक पूरी सभ्यता, एक संघर्ष और एक उम्मीद की गूंज होती है।

