नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि मतदाता सूची (वोटर लिस्ट) में किसी व्यक्ति का नाम नहीं होने या हट जाने से उसकी भारतीय नागरिकता स्वतः समाप्त नहीं हो जाती।
अदालत ने कहा कि चुनाव आयोग को नागरिकता तय करने का संवैधानिक अधिकार नहीं है, उसका अधिकार केवल मतदाता सूची के नियंत्रण और पर्यवेक्षण तक सीमित है।
शुक्रवार को पश्चिम बंगाल में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) से जुड़ी एक याचिका पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने यह महत्वपूर्ण टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि नागरिकता निर्धारण की एक अलग कानूनी प्रक्रिया है और इसे वोटर लिस्ट से नहीं जोड़ा जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि किसी ट्रिब्यूनल द्वारा किसी व्यक्ति का नाम एसआईआर सूची में शामिल नहीं करने का निर्णय दिया जाता है, तो निर्वाचन आयोग नागरिकता से संबंधित मामला संबंधित मंत्रालय को भेज सकता है। केवल मतदाता सूची में नाम न होने के आधार पर किसी की नागरिकता समाप्त नहीं मानी जा सकती।
अदालत ने पश्चिम बंगाल में विधानसभा क्षेत्रवार एसआईआर से जुड़ी जानकारी मांगने वाली याचिका को भी सुनवाई के लिए स्वीकार कर लिया है। मामले की अगली सुनवाई 25 अगस्त को होगी।
सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया कि एसआईआर और मतदाता सूची का नागरिकता से कोई सीधा संबंध नहीं है तथा इस विषय में कानून की स्थिति पूरी तरह स्पष्ट है।
उल्लेखनीय है कि हाल ही में झारखंड का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था, जिसमें एसआईआर फॉर्म भरने के नाम पर कथित तौर पर 50 से 100 रुपये तक की अवैध वसूली किए जाने का दावा किया गया था। वीडियो में आरोप लगाया गया था कि नागरिकता बचाने के नाम पर लोगों से पैसे लिए जा रहे थे। सुप्रीम कोर्ट की ताजा टिप्पणी के बाद इस तरह की भ्रांतियों पर भी विराम लगने की उम्मीद है।

