दिल्ली की घटना ने फिर खड़े किए पत्रकार की पहचान, सुरक्षा और अभिव्यक्ति की आज़ादी पर सवाल
लेखक — अज़हर उमरी, वरिष्ठ पत्रकार
आज जब पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है, तब एक सवाल बेहद बेचैनी के साथ सामने आता है—क्या आज के दौर में मुसलमान पत्रकार होना गुनाह है?
यह सवाल केवल भावनात्मक नहीं है। यह उस माहौल से पैदा हुआ है, जिसमें पत्रकार की खबर से पहले उसकी पहचान देखी जाने लगी है। नाम क्या है, धर्म क्या है, किस विचारधारा के करीब माना जाता है—इन सवालों के आधार पर पत्रकारिता का मूल्यांकन होने लगे तो यह लोकतंत्र के लिए गंभीर चिंता का विषय है।
हाल ही में दिल्ली में महिला पत्रकार के साथ मारपीट की घटना ने एक बार फिर पत्रकारों की सुरक्षा और उनके काम के दौरान सामने आने वाले दबाव पर बहस को जन्म दिया है। किसी भी पत्रकार के साथ हिंसा—चाहे वह महिला हो या पुरुष, किसी भी धर्म या विचारधारा से जुड़ा हो—लोकतांत्रिक समाज में स्वीकार्य नहीं हो सकती।
पत्रकार से असहमति हो सकती है, उसकी खबर पर सवाल उठाया जा सकता है, उसके तथ्यों की जांच की जा सकती है, लेकिन हिंसा किसी भी स्थिति में जवाब नहीं हो सकती।
सवाल दिल्ली की घटना से आगे का है
दिल्ली की घटना को केवल एक घटना मानकर भूल जाना आसान है। लेकिन इससे बड़ा सवाल यह है कि क्या हमारे समाज में पत्रकारों के प्रति असहमति का स्तर इतना बढ़ गया है कि खबर पसंद न आने पर पत्रकार ही निशाने पर आ जाए?
और जब पत्रकार की पहचान उसके नाम और धर्म से तय की जाने लगे, तब स्थिति और अधिक गंभीर हो जाती है।
मुसलमान पत्रकार के सामने कई बार एक अजीब तरह की चुनौती होती है। यदि वह मुस्लिम समाज की समस्याओं पर लिखता है तो उसे पक्षपाती कहा जा सकता है। यदि वह मुस्लिम समाज की कमियों पर सवाल उठाता है तो उससे पूछा जा सकता है कि वह अपने समुदाय के खिलाफ क्यों लिख रहा है। यदि वह सरकार से सवाल करे तो उसकी नीयत पर सवाल उठ सकता है और यदि सरकार के किसी फैसले की प्रशंसा करे तो उसे अलग नजर से देखा जा सकता है।
तो आखिर पत्रकार करे क्या?
पत्रकार की पहचान उसकी कलम से होनी चाहिए
पत्रकार की पहली पहचान पत्रकार होना है।
उसका धर्म उसकी निजी आस्था है, लेकिन उसकी पत्रकारिता का आधार तथ्य, सत्य, निष्पक्षता और जनहित होना चाहिए।
एक मुसलमान पत्रकार अगर किसी हिंदू परिवार की समस्या को सामने लाता है, किसी दलित की आवाज उठाता है, किसी महिला के साथ हुए अन्याय पर सवाल करता है या किसी सरकारी विभाग की लापरवाही उजागर करता है, तो उसकी पत्रकारिता को उसके मजहब के चश्मे से क्यों देखा जाए?
उसी तरह यदि वह मुस्लिम समाज की किसी समस्या पर लिखता है तो उसे केवल इसलिए पक्षपाती नहीं कहा जा सकता कि वह मुसलमान है।
समस्या पत्रकार का धर्म नहीं, पत्रकारिता में ईमानदारी या बेईमानी है।
महिला पत्रकार के साथ हिंसा पर समाज को सोचना होगा
दिल्ली की घटना का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि पत्रकारों की सुरक्षा पर गंभीरता से विचार होना चाहिए।
महिला पत्रकारों को फील्ड में काम करते समय कई तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। रिपोर्टिंग के दौरान भीड़, राजनीतिक कार्यकर्ताओं, दबाव समूहों या असहमति रखने वाले लोगों का सामना करना पड़ सकता है।
ऐसे में पत्रकार के साथ मारपीट केवल एक व्यक्ति पर हमला नहीं है। यह स्वतंत्र पत्रकारिता के अधिकार पर हमला है।
किसी खबर से असहमति है तो जवाब खबर से दिया जाना चाहिए। तथ्य गलत हैं तो तथ्य सामने रखे जाने चाहिए। पत्रकार ने कानून तोड़ा है तो कानूनी प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए।
लेकिन हाथ उठाना किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था का समाधान नहीं है।
मुसलमान पत्रकार होना गुनाह नहीं
इस सवाल का जवाब स्पष्ट होना चाहिए—
नहीं, मुसलमान पत्रकार होना गुनाह नहीं है।
गुनाह, यदि कोई है, तो वह पत्रकारिता में झूठ, रिश्वत, पक्षपात, फर्जी खबर और जानबूझकर समाज को गुमराह करना है—और यह किसी एक धर्म के पत्रकार तक सीमित नहीं है।
जिस तरह किसी हिंदू पत्रकार से यह उम्मीद नहीं की जाती कि वह हर खबर को हिंदू दृष्टिकोण से देखे, उसी तरह मुसलमान पत्रकार से भी यह उम्मीद नहीं की जानी चाहिए कि वह हर खबर को मुस्लिम दृष्टिकोण से देखे।
पत्रकारिता का धर्म सच है।
पत्रकार को भी अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी
पत्रकारों की सुरक्षा की बात करते समय पत्रकारिता की जिम्मेदारी को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
खबर प्रकाशित करने से पहले तथ्य-जांच, दोनों पक्षों को सुनना, आरोप और सत्यापित तथ्य के बीच अंतर रखना तथा भाषा में संयम बरतना पत्रकार का दायित्व है।
स्वतंत्रता के साथ जिम्मेदारी जुड़ी हुई है।
लेकिन पत्रकार की किसी गलती का समाधान भी कानून और संस्थागत प्रक्रिया से होना चाहिए, हिंसा से नहीं।
सवाल हम सबके सामने है
दिल्ली की घटना हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि हम किस तरह का मीडिया और किस तरह का लोकतांत्रिक समाज चाहते हैं?
क्या हम ऐसा समाज चाहते हैं जहां पत्रकार केवल वही लिखे जो प्रभावशाली लोगों को पसंद हो?
या फिर ऐसा लोकतंत्र चाहते हैं जहां पत्रकार सत्ता से भी सवाल कर सके, विपक्ष से भी, समाज से भी और जरूरत पड़ने पर अपने ही समुदाय से भी?
अगर जवाब दूसरा है, तो हमें पत्रकार की पहचान नहीं, उसकी खबर देखनी होगी।
मुसलमान पत्रकार हो या किसी अन्य धर्म का पत्रकार—उसे सुरक्षा भी मिलनी चाहिए और अपनी बात रखने की स्वतंत्रता भी।
क्योंकि पत्रकार की कलम को धर्म के खांचे में बंद कर दिया गया तो नुकसान किसी एक समुदाय का नहीं होगा।
नुकसान लोकतंत्र का होगा।
और शायद आज सबसे बड़ा सवाल यही है—
“क्या पत्रकार को सच लिखने से पहले अपना मजहब बताना पड़ेगा?”
अगर जवाब “नहीं” है, तो फिर हर पत्रकार की सुरक्षा, स्वतंत्रता और सम्मान की रक्षा करना हम सबकी जिम्मेदारी है।
— अज़हर उमरी
वरिष्ठ पत्रकार
