लेखक – अज़हर उमरी
वरिष्ठ पत्रकार एवं सामाजिक चिंतक
विशेषज्ञों की चेतावनी—छोटी उम्र में ज़्यादा स्क्रीन टाइम से बातचीत, एकाग्रता और बोलने के विकास पर पड़ सकता है असर
नई दिल्ली। मोबाइल फोन और टैबलेट पर लगातार वीडियो देखने की आदत छोटे बच्चों के मानसिक और भाषायी विकास को प्रभावित कर सकती है। बाल रोग विशेषज्ञों का कहना है कि खासकर दो से पांच वर्ष की उम्र में बच्चों का अत्यधिक स्क्रीन इस्तेमाल उनकी बोलने की क्षमता, एकाग्रता और माता-पिता के साथ संवाद को प्रभावित कर सकता है।
विशेषज्ञों के मुताबिक आजकल रील्स, शॉर्ट्स और तेजी से बदलने वाले छोटे वीडियो बच्चों के बीच काफी लोकप्रिय हैं। ऐसे वीडियो में कुछ ही सेकेंड में नया दृश्य या नया कंटेंट सामने आने के कारण बच्चों को लगातार तेज उत्तेजना मिलती रहती है। इसका असर उनकी उन गतिविधियों में रुचि पर पड़ सकता है जिनमें धैर्य और लगातार ध्यान की जरूरत होती है।
छह-सात घंटे मोबाइल देखने वाला बच्चा
डॉक्टरों के सामने ऐसा मामला भी आया जिसमें करीब ढाई साल का बच्चा अपनी उम्र के दूसरे बच्चों की तुलना में बहुत कम शब्द बोल रहा था। चिकित्सकीय जांच में उसकी सुनने की क्षमता, दृष्टि और तंत्रिका तंत्र समेत अन्य विकास संबंधी पहलू सामान्य पाए गए।
माता-पिता से विस्तृत जानकारी लेने पर पता चला कि बच्चा रोजाना करीब छह से सात घंटे मोबाइल फोन पर कार्टून और छोटे वीडियो देखता था। यहां तक कि खाना खाते समय भी उसके हाथ में मोबाइल रहता था। मोबाइल हटाने पर वह चिड़चिड़ा होने लगता था।
डॉक्टरों ने पाया कि बच्चे में मुख्य समस्या भाषा और बोलने के विकास की गति से जुड़ी थी। माता-पिता के व्यस्त रहने के कारण बच्चे के साथ आमने-सामने बातचीत और खेल का समय भी काफी कम था।
मोबाइल कम किया तो दिखा सुधार
विशेषज्ञों ने मनोरंजन के लिए स्क्रीन का इस्तेमाल कम करने, भोजन के समय मोबाइल पूरी तरह बंद रखने और बच्चे के साथ रोजाना आमने-सामने समय बिताने की सलाह दी। इसके साथ ही चित्रों वाली किताबें पढ़ने, रोजमर्रा की गतिविधियों के दौरान बच्चे से बातचीत करने और जरूरत पड़ने पर स्पीच एवं लैंग्वेज थेरेपी की मदद लेने की सलाह दी गई।
इन बदलावों के बाद बच्चे में उल्लेखनीय सुधार देखने को मिला।
भाषा सीखने के लिए बातचीत और खेल जरूरी
बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. राहुल दराल के अनुसार, छोटे बच्चों के शुरुआती वर्षों में भाषा सीखने के लिए माता-पिता से बातचीत, कहानी सुनना, किताबें पढ़ना और खेलना बेहद महत्वपूर्ण है। जब बच्चा लंबे समय तक स्क्रीन पर व्यस्त रहता है तो इन स्वाभाविक गतिविधियों के लिए मिलने वाला समय कम हो जाता है।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि बच्चों में एकाग्रता की कमी के लिए केवल रील्स या शॉर्ट्स को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। नींद, शारीरिक गतिविधि, घर का माहौल और माता-पिता का व्यवहार भी बच्चे के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
तुरंत मिलने वाले मनोरंजन की आदत से बचाएं
विशेषज्ञों के मुताबिक लगातार स्क्रीन स्क्रॉल करने से बच्चे का दिमाग बार-बार मिलने वाले तेज और तत्काल मनोरंजन का अभ्यस्त हो सकता है। ऐसे में पढ़ाई, किताब पढ़ने, गृहकार्य या संगीत जैसी गतिविधियां उन्हें अपेक्षाकृत कम आकर्षक लग सकती हैं।
डॉक्टरों की सलाह है कि दो वर्ष से कम उम्र के बच्चों को मनोरंजन के लिए स्क्रीन से यथासंभव दूर रखा जाए। वहीं दो से पांच वर्ष के बच्चों के लिए मनोरंजन संबंधी स्क्रीन टाइम को आदर्श रूप से प्रतिदिन एक घंटे से कम रखने की कोशिश करनी चाहिए।
सिर्फ मोबाइल छीनना समाधान नहीं
विशेषज्ञों का कहना है कि समस्या का समाधान केवल बच्चे से मोबाइल छीन लेना नहीं है। परिवार को मिलकर स्वस्थ डिजिटल आदतें विकसित करनी होंगी।
इसके लिए भोजन और सोने के कमरे को स्क्रीन-मुक्त रखना, सोने से कम से कम एक घंटा पहले स्क्रीन बंद करना, बच्चों को रोजाना बाहर खेलने या शारीरिक गतिविधि के लिए प्रोत्साहित करना और कहानी, किताब तथा बातचीत के लिए नियमित समय निकालना जरूरी है।
विशेषज्ञों ने माता-पिता को यह भी सलाह दी है कि वे स्वयं मोबाइल के संतुलित इस्तेमाल का उदाहरण पेश करें, क्योंकि बच्चे अपने आसपास के लोगों के व्यवहार से सबसे अधिक सीखते हैं।
