फिल्म के आखिरी दृश्य में ‘हे राम’ बोलने पर उठा सवाल, मामला पहुंचा तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू तक
मुंबई। हिंदी सिनेमा के महान अभिनेता दिलीप कुमार की ऐतिहासिक फिल्म गंगा-जमुना से जुड़ा एक ऐसा किस्सा सामने आया है, जो न सिर्फ फिल्मी दुनिया की सोच को दिखाता है, बल्कि उस दौर की सेंसरशिप की एक दिलचस्प तस्वीर भी पेश करता है।
फिल्म के क्लाइमेक्स में दिलीप कुमार का किरदार ‘गंगा’ मौत से पहले ‘हे राम’ कहता है। यहीं से सेंसर बोर्ड के सामने सवाल खड़ा हो गया। फिल्म की स्क्रीनिंग के दौरान बोर्ड के सदस्यों ने कथित तौर पर पूछा— दिलीप कुमार मुसलमान हैं, फिर वह ‘हे राम’ कैसे बोल सकते हैं?
फिल्म के निर्माताओं ने साफ तर्क दिया कि कलाकार की निजी पहचान और उसके द्वारा निभाए जा रहे किरदार की पहचान अलग होती है। गंगा-जमुना में दिलीप कुमार एक हिंदू किरदार ‘गंगा’ की भूमिका निभा रहे थे, इसलिए उसके मुंह से ‘हे राम’ निकलना कहानी के मुताबिक बिल्कुल स्वाभाविक था।
लेकिन सेंसर बोर्ड इस तर्क से संतुष्ट नहीं हुआ और फिल्म की रिलीज पर अड़चन बनी रही।
जब मामला पहुंचा नेहरू तक
मामला बढ़ते-बढ़ते तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू तक पहुंच गया। बताया जाता है कि नेहरू ने खुद गंगा-जमुना देखी और फिल्म में उन्हें कोई समस्या नजर नहीं आई।
लेकिन इसके बाद भी फिल्म की रिलीज को लेकर एक अलग तरह की दुविधा सामने आ गई।
उस समय सेंसर बोर्ड ने कई दूसरी फिल्मों की रिलीज भी रोक रखी थी। यदि केवल गंगा-जमुना को रिलीज की अनुमति मिलती तो यह सवाल उठ सकता था कि प्रधानमंत्री से दिलीप कुमार की जान-पहचान का फायदा उठाकर फिल्म को मंजूरी दिलाई गई।
ऐसे में अन्य फिल्मों को भी रिलीज की अनुमति दी गई और इसके बाद गंगा-जमुना के लिए रास्ता साफ हुआ।
आजादी से पहले भी फिल्मकार निकाल लेते थे रास्ता
फिल्मकार और अभिनेता तिग्मांशु धूलिया ने सेंसरशिप के पुराने दौर का जिक्र करते हुए बताया कि आजादी से पहले भारतीय फिल्मकारों के सामने चुनौतियां और भी बड़ी थीं। इसके बावजूद कई फिल्मकार ऐसी तरकीबों से देशभक्ति की बात फिल्मों में रखते थे कि ब्रिटिश हुकूमत को उसका असली संदेश समझ ही नहीं आता था।
उन्होंने ज्ञान मुखर्जी की फिल्म ‘चल चल रे नौजवान’ का उदाहरण दिया। फिल्म में अशोक कुमार मुख्य भूमिका में थे। संगीत गुलाम हैदर और रफीक गजनवी ने दिया था, जबकि इसके लेखक मशहूर उर्दू साहित्यकार सआदत हसन मंटो थे।
दिलीप कुमार की ‘गंगा-जमुना’ का यह किस्सा सिर्फ एक फिल्म की सेंसरशिप की कहानी नहीं, बल्कि उस दौर के भारतीय सिनेमा, समाज और अभिव्यक्ति की जटिलताओं की भी झलक देता है।
— Times of Taj
