रिवॉल्वर में उंगली छोटी पड़ रही थी, लेकिन हौसला सबसे बड़ा था
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम केवल सभाओं, भाषणों और बड़े नेताओं तक सीमित नहीं था। यह संघर्ष स्कूल की बेंचों, छात्रावासों और किशोर मनों में भी धड़क रहा था। ऐसा ही एक साहसिक और कम चर्चित अध्याय 14 दिसंबर 1931 को सामने आया, जब दो स्कूली छात्राओं — शांति घोष और सुनीति चौधरी — ने ब्रिटिश सत्ता की नींव हिला दी।
भगत सिंह की शहादत से जगी चिंगारी
23 मार्च 1931 को शहीद-ए-आज़म भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी दिए जाने से पूरा देश शोक और आक्रोश में डूबा था। यह पीड़ा केवल युवाओं तक सीमित नहीं थी, बल्कि स्कूल में पढ़ने वाली बच्चियों के मन में भी आग बनकर सुलग रही थी।
कॉमिल्ला (तत्कालीन बंगाल प्रांत) के फ़ैज़ुन्नेसा गर्ल्स स्कूल में पढ़ने वाली शांति घोष और सुनीति चौधरी ने तय कर लिया कि वे अन्याय का जवाब चुप्पी से नहीं देंगी।
किताबों के बीच छुपी क्रांति
दोनों छात्राएँ स्कूल यूनिफॉर्म में थीं। किताबों और कॉपियों के बीच एक छोटी रिवॉल्वर छुपाई गई। बाद में सुनीति चौधरी ने स्वीकार किया कि रिवॉल्वर भारी थी और ट्रिगर दबाने में उनकी उंगली छोटी पड़ रही थी, लेकिन मन में डर से बड़ा संकल्प था।
उनके लिए वह केवल एक हथियार नहीं था, बल्कि भगत सिंह की शहादत का प्रतीक था।
अंग्रेज़ी हुकूमत पर सीधा वार
14 दिसंबर 1931 को जब कॉमिल्ला के अंग्रेज़ ज़िला मजिस्ट्रेट चार्ल्स जियोफ़्री बकलैंड अपने कार्यालय पहुँचे, तो दोनों छात्राएँ उनसे मिलने के बहाने अंदर दाख़िल हुईं।
पहले सुनीति चौधरी ने गोली चलाई और फिर शांति घोष ने नज़दीक जाकर दूसरा फ़ायर किया।
डीएम बकलैंड की मौके पर ही मौत हो गई। ब्रिटिश प्रशासन सन्न रह गया।
गिरफ्तारी के बाद भी निडर
दोनों को तुरंत गिरफ़्तार कर लिया गया। पूछताछ में न कोई डर, न पछतावा। जब उनसे पूछा गया कि उन्होंने ऐसा क्यों किया, तो जवाब था—
“यह भगत सिंह और देश के शहीदों की फांसी का बदला है।”
अदालत में भी उन्होंने माफी नहीं मांगी। अंग्रेज़ जजों तक को यह स्वीकार करना पड़ा कि यह साधारण अपराध नहीं, बल्कि राजनीतिक विद्रोह था।
सज़ा, संघर्ष और आज़ाद भारत
नाबालिग होने के कारण दोनों को कठोर दंड तो दिया गया, लेकिन बाद में बदले हालात में रिहाई मिली।
आज़ाद भारत में सुनीति चौधरी पश्चिम बंगाल की विधायक बनीं, जबकि शांति घोष सामाजिक और शैक्षिक कार्यों से जुड़ी रहीं।
इतिहास की अनकही आवाज़
यह घटना आज भी सवाल करती है—
क्या आज़ादी केवल बड़े मंचों से आई थी?
या उन नन्ही उंगलियों से भी, जो ट्रिगर तक ठीक से नहीं पहुँचती थीं, लेकिन हौसले से इतिहास बदल देती थीं?
शांति घोष और सुनीति चौधरी
ये नाम सिर्फ़ इतिहास नहीं,
बल्कि साहस, चेतना और देशप्रेम की जीवित मिसाल हैं।

