लेखक: अज़हर उमरी
(वरिष्ठ पत्रकार, सामाजिक चिंतक, शिक्षाविद)
अरावली पर्वतमाला भारत की सबसे प्राचीन पर्वत श्रृंखलाओं में से एक है। यह केवल पत्थरों और पहाड़ियों का समूह नहीं, बल्कि उत्तर भारत के पर्यावरणीय संतुलन की रीढ़ है। राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली और गुजरात तक फैली अरावली पर्वतमाला रेगिस्तान के विस्तार को रोकने, भूजल स्तर को बनाए रखने और जैव-विविधता के संरक्षण में निर्णायक भूमिका निभाती है। इसके बावजूद आज अरावली को विकास के नाम पर जिस तरह से नष्ट किया जा रहा है, वह गहरी चिंता का विषय है।
अरावली और पर्यावरणीय सुरक्षा
अरावली पर्वत प्राकृतिक ढाल के रूप में काम करता है। यह पश्चिम से आने वाली गर्म हवाओं और रेगिस्तानी विस्तार को रोकता है। यदि अरावली कमजोर होती है तो दिल्ली-एनसीआर सहित पूरे उत्तर भारत में जल संकट, वायु प्रदूषण और जलवायु असंतुलन और भयावह रूप ले सकता है। पहले से ही दिल्ली दुनिया के सबसे प्रदूषित शहरों में गिनी जाती है, और अरावली का क्षरण इस संकट को कई गुना बढ़ा सकता है।
अवैध खनन और तथाकथित विकास
अरावली पर्वत का सबसे बड़ा दुश्मन अवैध खनन है। पत्थर, बजरी और खनिजों की अंधाधुंध खुदाई ने पहाड़ों को खोखला कर दिया है। इसके साथ ही फार्महाउस, रियल एस्टेट परियोजनाएं और सड़क निर्माण के नाम पर बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई की जा रही है। यह विकास नहीं, बल्कि भविष्य की पीढ़ियों के लिए संकट का निर्माण है।
जल स्रोतों पर सीधा प्रभाव
अरावली क्षेत्र भूजल पुनर्भरण (ग्राउंड वाटर रिचार्ज) का प्रमुख क्षेत्र है। यहां की चट्टानें वर्षा जल को रोककर जमीन के भीतर भेजती हैं। लेकिन जब पहाड़ ही काट दिए जाएंगे, तो न पानी बचेगा और न जीवन। हरियाणा, राजस्थान और दिल्ली के कई इलाके पहले ही गंभीर जल संकट का सामना कर रहे हैं, जिसमें अरावली का क्षरण बड़ी वजह बनता जा रहा है।
जैव-विविधता और वन्यजीवों का संकट
अरावली पर्वत अनेक दुर्लभ वनस्पतियों, पक्षियों और वन्यजीवों का घर है। तेंदुए, सियार, नीलगाय, मोर और सैकड़ों पक्षी प्रजातियां इस क्षेत्र पर निर्भर हैं। जंगलों के खत्म होने से मानव-वन्यजीव संघर्ष भी बढ़ रहा है, जिसका खामियाजा इंसान और जानवर दोनों को भुगतना पड़ रहा है।
कानून और ज़मीनी हकीकत
सुप्रीम कोर्ट और नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) अरावली के संरक्षण को लेकर कई बार सख्त निर्देश दे चुके हैं। बावजूद इसके, ज़मीनी स्तर पर नियमों का खुला उल्लंघन जारी है। यह प्रशासनिक उदासीनता और राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी को उजागर करता है।
संरक्षण ही स्थायी विकास
विकास और पर्यावरण को आमने-सामने खड़ा करना सबसे बड़ी भूल है। वास्तविक विकास वही है जो प्रकृति के साथ तालमेल बैठाकर हो। अरावली क्षेत्र में इको-टूरिज्म, जल संरक्षण परियोजनाएं, हरित रोजगार और वन आधारित आजीविका के अवसर विकसित किए जा सकते हैं, जिससे पर्यावरण भी बचे और लोगों को रोजगार भी मिले।
समाज की जिम्मेदारी
अरावली को बचाने की जिम्मेदारी केवल सरकार की नहीं, बल्कि समाज की भी है। जब तक नागरिक जागरूक नहीं होंगे और पर्यावरण विनाश के खिलाफ आवाज़ नहीं उठाएंगे, तब तक नीतियां कागज़ों तक ही सीमित रहेंगी।
निष्कर्ष
अरावली पर्वत को बचाना दरअसल जीवन को बचाना है। यदि आज हमने लालच और लापरवाही में इसे नष्ट होने दिया, तो आने वाली पीढ़ियां हमें कभी माफ़ नहीं करेंगी। अब भी समय है कि विनाश के रास्ते से लौटकर संरक्षण का मार्ग अपनाया जाए। अरावली को काटने की नहीं, बचाने की ज़रूरत है।

