लेखक: तबस्सुम अब्बास
(शिक्षिका, सामाजिक चिंतक, शिक्षाविद)
आज के डिजिटल दौर में मोबाइल फोन हमारी ज़िंदगी का अहम हिस्सा बन चुका है। यह सहूलियत, जानकारी और मनोरंजन का साधन है, लेकिन जब यही मोबाइल घर-परिवार, खासकर बच्चों से ज़्यादा अहम हो जाए, तो यह चिंता का विषय बन जाता है। दुर्भाग्य से आज कई घरों में यही तस्वीर देखने को मिलती है, जहाँ गृहणियाँ अपने बच्चों से ज़्यादा समय मोबाइल स्क्रीन को दे रही हैं।
माँ और बच्चे का रिश्ता: समय की ज़रूरत
माँ बच्चे की पहली शिक्षक होती है। उसकी गोद, उसकी बातें, उसका स्नेह—यही बच्चे के मानसिक, भावनात्मक और सामाजिक विकास की बुनियाद रखते हैं। लेकिन जब माँ का ध्यान हर समय मोबाइल में उलझा रहे, तो बच्चा खुद को उपेक्षित महसूस करता है। धीरे-धीरे यह उपेक्षा बच्चे के व्यवहार, आत्मविश्वास और सीखने की क्षमता पर असर डालने लगती है।
मोबाइल की लत और उसके दुष्परिणाम
मोबाइल का अत्यधिक उपयोग न सिर्फ बड़ों, बल्कि बच्चों के लिए भी हानिकारक है। जब माँ खुद हर समय मोबाइल में व्यस्त रहती है, तो वह अनजाने में बच्चे को भी वही आदत सिखा देती है।
इसके परिणामस्वरूप:
- बच्चे चिड़चिड़े और जिद्दी हो जाते हैं
- संवाद और भावनात्मक जुड़ाव कम हो जाता है
- पढ़ाई और रचनात्मक गतिविधियों में रुचि घटती है
- पारिवारिक रिश्तों में दूरी बढ़ती है
घर का माहौल और संस्कार
घर का माहौल बच्चों के व्यक्तित्व को गढ़ता है। अगर माँ मोबाइल में खोई रहेगी, तो बच्चे सवाल पूछना, अपनी बातें साझा करना और भावनाएँ व्यक्त करना छोड़ देंगे। इससे संस्कार, तहज़ीब और आपसी संवाद कमजोर पड़ता है। बच्चे तकनीक तो सीख लेंगे, लेकिन इंसानियत, संवेदना और रिश्तों की अहमियत नहीं समझ पाएंगे।
समाधान: संतुलन ज़रूरी है
यह कहना गलत होगा कि मोबाइल का इस्तेमाल बिल्कुल न किया जाए। असल ज़रूरत संतुलन की है।
गृहणियों को चाहिए कि:
- बच्चों के साथ तय समय बिताएँ
- उनके खेल, पढ़ाई और सवालों में रुचि लें
- मोबाइल का उपयोग ज़रूरत और सीमित समय के लिए करें
- बच्चों के सामने मोबाइल आदतों का अच्छा उदाहरण पेश करें
मोबाइल एक साधन है, विकल्प नहीं। बच्चों की परवरिश किसी स्क्रीन से नहीं, बल्कि माँ के समय, प्यार और मार्गदर्शन से होती है। अगर गृहणियाँ आज अपने मोबाइल से थोड़ा वक्त निकालकर बच्चों को देंगी, तो वही बच्चे कल एक संवेदनशील, जिम्मेदार और सशक्त समाज की नींव बनेंगे।
इसलिए ज़रूरी है कि
“गृहणी बच्चों को समय दे, मोबाइल को नहीं।”

