लेखक: तबस्सुम अब्बास
(शिक्षिका, सामाजिक चिंतक शिक्षाविद)
इस्लामी कैलेंडर में कुछ तारीख़ें सिर्फ़ दिन नहीं होतीं, बल्कि एहसास बनकर दिलों में उतर जाती हैं। 22 रजब अल-मुबारक भी ऐसी ही एक मुबारक तारीख़ है, जो अकीदत, सब्र, दुआ और इंसानियत के पैग़ाम से जुड़ी हुई है। यह दिन खास तौर पर हज़रत इमाम जाफ़र सादिक़ (रह.) की याद से जुड़ा है, जिनका इल्म, किरदार और इंसानी सोच आज भी रहनुमाई करती है।
हज़रत इमाम जाफ़र सादिक़ (रह.) इस्लामी इतिहास की उन महान हस्तियों में से हैं, जिन्होंने मज़हब को सिर्फ़ इबादत तक सीमित नहीं रखा, बल्कि इल्म, अख़लाक़ और समाजी ज़िम्मेदारी से जोड़ा। उन्हें “इमाम-ए-इल्म” भी कहा जाता है। फ़िक़्ह, तफ़सीर, हदीस, रसायन विज्ञान और दर्शन जैसे विषयों में उनकी गहरी समझ थी। इमाम अबू हनीफ़ा (रह.) और इमाम मालिक (रह.) जैसे महान विद्वान भी उनके इल्मी फ़ैज़ से लाभान्वित हुए।
22 रजब का दिन हमें यह याद दिलाता है कि मज़हब का असल मक़सद इंसान को बेहतर इंसान बनाना है। आज जब दुनिया नफ़रत, हिंसा और स्वार्थ से जूझ रही है, इमाम जाफ़र सादिक़ (रह.) की ज़िंदगी हमें सब्र, सहिष्णुता और संवाद का रास्ता दिखाती है। उन्होंने कभी ज़ोर-ज़बरदस्ती या कट्टरता को इस्लाम का हिस्सा नहीं माना, बल्कि मोहब्बत और दलील को दावत का ज़रिया बनाया।
इस दिन कई जगहों पर फ़ातिहा, नज़्र-नियाज़ और दुआओं का एहतमाम किया जाता है। लोग ग़रीबों और ज़रूरतमंदों की मदद करते हैं, क्योंकि यही इस दिन की रूह है। 22 रजब हमें यह सिखाता है कि इबादत सिर्फ़ मस्जिद या दुआ तक सीमित नहीं, बल्कि भूखे को खाना खिलाना, दुखी को ढांढस देना और ज़ुल्म के ख़िलाफ़ खड़ा होना भी इबादत है।
आज के दौर में जब धर्म को अक्सर सियासत या तकरार से जोड़ दिया जाता है, 22 रजब अल-मुबारक हमें याद दिलाता है कि दीन का असली चेहरा इंसानियत है। अगर हम इमाम जाफ़र सादिक़ (रह.) की तालीमात को अपनी ज़िंदगी में उतार लें—सच बोलना, इंसाफ़ करना, इल्म हासिल करना और सबके साथ भलाई करना—तो समाज अपने आप बेहतर बन सकता है।
22 रजब अल-मुबारक सिर्फ़ एक तारीख़ नहीं, बल्कि आत्ममंथन का मौक़ा है। यह दिन हमें अपने किरदार, अपने रिश्तों और अपने समाज को देखने का आईना देता है। दुआ है कि यह मुबारक दिन हमारे दिलों में नूर, ज़िंदगियों में अमन और समाज में इंसाफ़ पैदा करे।
आमीन।

