नमाज़ में पढ़ी जाने वाली अत्तहियात, जिसे तशह्हुद भी कहा जाता है, कोई साधारण दुआ नहीं है। यह वह मुबारक कलाम है जो शबे-ए-मेराज की रात अल्लाह तआला और हमारे प्यारे नबी हज़रत मुहम्मद ﷺ के बीच हुई पाक और नूरानी बातचीत को बयान करता है। यही वजह है कि नमाज़ का यह हिस्सा हर मोमिन के लिए बहुत खास और मुक़द्दस माना जाता है।
मेराज की रात का रूहानी मंज़र
जब अल्लाह तआला ने अपने हबीब ﷺ को मेराज की रात आसमानों की सैर कराई और अपनी बारगाह में बुलाया, तो उस वक़्त नबी-ए-करीम ﷺ ने अदब और मोहब्बत से अल्लाह की हम्द बयान की:
“अत्तहिय्यातु लिल्लाहि वस्सलवातु वत्तैयिबातु”
यानी: सारी ज़बानी, बदनी और माली इबादतें सिर्फ़ अल्लाह के लिए हैं।
इस जुमले से रसूल ﷺ ने यह एलान किया कि हर तरह की बंदगी, हर पाकीज़ा अमल और हर नेकी केवल अल्लाह के लिए है।
अल्लाह का जवाब: अमन और रहमत की दुआ
अल्लाह तआला ने अपने महबूब रसूल ﷺ को जवाब में फ़रमाया:
“अस्सलामु अलैका अय्युहन नबिय्यु व रहमतुल्लाहि व बरकातुहू”
अर्थात: ऐ नबी! आप पर सलाम हो और अल्लाह की रहमत और बरकतें हों।
यह अल्लाह की तरफ़ से अपने रसूल ﷺ के लिए इज़्ज़त, मोहब्बत और अमन का पैग़ाम था।
नबी ﷺ की उम्मत के लिए मोहब्बत
इस पर रसूल ﷺ ने सिर्फ़ अपने लिए नहीं, बल्कि पूरी उम्मत के लिए सलामती की दुआ की:
“अस्सलामु अलैना व अला इबादिल्लाहिस्सालिहीन”
यानि: हम पर और अल्लाह के नेक बंदों पर सलामती हो।
यह जुमला नबी ﷺ की उम्मत से बेपनाह मोहब्बत और रहमत को दर्शाता है।
फ़रिश्तों की गवाही
फिर फ़रिश्तों ने इस मुक़द्दस बातचीत की तस्दीक़ करते हुए कहा:
“अश्हदु अल्ला इलाहा इल्लल्लाहु व अश्हदु अन्ना मुहम्मदन अब्दुहू व रसूलुहू”
अर्थात: हम गवाही देते हैं कि अल्लाह के सिवा कोई माबूद नहीं और मुहम्मद ﷺ अल्लाह के बंदे और रसूल हैं।
नमाज़ में अत्तहियात की अहमियत
इसी पाक बातचीत को अल्लाह तआला ने हर नमाज़ का हिस्सा बना दिया, ताकि हर मोमिन नमाज़ के दौरान मेराज की उस रूहानी बातचीत में शामिल हो जाए। जब हम तशह्हुद पढ़ते हैं, तो गोया हम भी अल्लाह और उसके रसूल ﷺ की उस पाक बातचीत को दोहरा रहे होते हैं۔
नतीजा
अत्तहियात सिर्फ़ अल्फ़ाज़ नहीं, बल्कि अकीदे, अदब और मोहब्बत का इज़हार है। यह हमें याद दिलाती है कि हमारी हर इबादत अल्लाह के लिए हो और हमारे दिल में नबी ﷺ और उनकी उम्मत के लिए अमन और मोहब्बत हो।

