शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद का तीखा सवाल
भारत में जब-जब सत्ता और आस्था की सीमाएँ उलझी हैं, तब-तब समाज के भीतर गहरी बहस जन्मी है। ऐसा ही एक प्रश्न हाल के दिनों में फिर उभरा है, जब ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने सीधे शब्दों में पूछा—
“क्या अब आस्था की पहचान भी सत्ता तय करेगी?
क्या उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री तय करेगा कि शंकराचार्य कौन है?”
यह सवाल केवल एक व्यक्ति या पद का नहीं, बल्कि सनातन परंपरा की आत्मा से जुड़ा हुआ है।
सत्ता बनाम सनातन परंपरा
शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद ने स्पष्ट कहा कि
“हम किसी प्रशासनिक प्रमाणपत्र से नहीं, सनातन परंपरा से शंकराचार्य हैं।”
उनका यह बयान उस सोच पर करारा प्रहार है, जिसमें धार्मिक पदों और आध्यात्मिक परंपराओं को प्रशासनिक या राजनीतिक मान्यता से जोड़कर देखा जाने लगा है।
सनातन धर्म में शंकराचार्य पद कोई सरकारी नियुक्ति नहीं, बल्कि गुरु-शिष्य परंपरा, शास्त्रीय मर्यादा और हजारों वर्षों से चली आ रही आध्यात्मिक व्यवस्था का परिणाम होता है।
शंकराचार्य पद: न सत्ता की देन, न कृपा का फल
आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित चार पीठों की परंपरा किसी राज्य, सरकार या मुख्यमंत्री की अधीनता में नहीं रही है।
यह परंपरा—
वेदों पर आधारित है
शास्त्रसम्मत उत्तराधिकार से चलती है
और राजनीतिक बदलावों से परे, आत्मिक अनुशासन पर टिकी है।
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का कहना है कि यदि आज सत्ता यह तय करने लगे कि कौन शंकराचार्य है, तो कल यही सत्ता यह भी तय करेगी कि धर्म क्या है और अधर्म क्या।
आस्था का प्रश्न, प्रशासन का नहीं
उनके वक्तव्य का मूल भाव यही है कि
आस्था प्रमाणपत्र से नहीं चलती।
जिस दिन धर्म को सत्ता की मोहर का मोहताज बना दिया गया, उस दिन सनातन की स्वतंत्र आत्मा पर पहला आघात होगा। शंकराचार्य पद कोई राजनीतिक पहचान नहीं, बल्कि त्याग, तपस्या और वैचारिक उत्तराधिकार की कसौटी है।
व्यापक अर्थों में चेतावनी
यह बयान सिर्फ़ उत्तर प्रदेश या किसी एक मुख्यमंत्री तक सीमित नहीं है।
यह उस प्रवृत्ति के ख़िलाफ़ चेतावनी है, जहाँ—
धर्म को राजनीतिक सुविधा के अनुसार परिभाषित किया जा रहा है
आस्था को प्रशासनिक आदेशों से नियंत्रित करने की कोशिश हो रही है।
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शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद का सवाल आज हर उस व्यक्ति से है, जो सनातन को सिर्फ़ सत्ता की छाया में सुरक्षित मानता है—
क्या धर्म सत्ता से चलता है,
या सत्ता को धर्म की सीमाओं में रहना चाहिए?
यह सवाल जितना तीखा है, उतना ही ज़रूरी भी।
✍️ लेखक: अज़हर उमरी
(वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक)

