लखनऊ/नई दिल्ली।उत्तर प्रदेश की राजनीति में कांग्रेस के लिए एक बार फिर चिंताजनक संकेत सामने आए हैं। बिजनौर के पूर्व जिला अध्यक्ष शेरबाज़ पठान के कांग्रेस छोड़ने के बाद अब पार्टी के वरिष्ठ मुस्लिम नेता और पूर्व मंत्री नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने भी कांग्रेस को अलविदा कह दिया है। लगातार हो रहे इन राजनीतिक झटकों ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है—आखिर मुस्लिम नेता कांग्रेस से क्यों दूरी बना रहे हैं?
लगातार टूटता भरोसा
कभी मुस्लिम समाज की स्वाभाविक राजनीतिक पसंद मानी जाने वाली कांग्रेस आज अपने ही नेताओं का भरोसा खोती नज़र आ रही है। नसीमुद्दीन सिद्दीकी जैसे कद्दावर नेता का पार्टी छोड़ना केवल एक इस्तीफ़ा नहीं, बल्कि कांग्रेस की संगठनात्मक कमजोरी और नेतृत्व संकट का संकेत माना जा रहा है।
सूत्रों के मुताबिक नसीमुद्दीन सिद्दीकी लंबे समय से पार्टी की निर्णय प्रक्रिया, जमीनी कार्यकर्ताओं की उपेक्षा और अल्पसंख्यक मुद्दों पर “सिर्फ़ बयानबाज़ी” से असंतुष्ट थे। उनका मानना था कि कांग्रेस अब न तो सड़क पर संघर्ष करती दिख रही है और न ही सत्ता के लिए गंभीर रणनीति बना पा रही है।
शेरबाज़ पठान के बाद दूसरा बड़ा झटका
इससे पहले बिजनौर कांग्रेस के पूर्व जिला अध्यक्ष शेरबाज़ पठान ने भी पार्टी से किनारा कर लिया था। उन्होंने खुलकर कहा था कि कांग्रेस में मेहनती नेताओं और कार्यकर्ताओं की कोई सुनवाई नहीं है और टिकट वितरण से लेकर संगठन विस्तार तक, सब कुछ दिल्ली और लखनऊ के चंद चेहरों तक सीमित हो गया है।
मुस्लिम नेतृत्व हाशिए पर?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस में मुस्लिम नेताओं को अब केवल “प्रतीकात्मक भूमिका” तक सीमित कर दिया गया है। ज़मीनी मुद्दों—जैसे सुरक्षा, शिक्षा, रोज़गार, बुलडोज़र कार्रवाई, सांप्रदायिक घटनाओं—पर पार्टी की कमजोर प्रतिक्रिया ने मुस्लिम समाज में यह संदेश दिया है कि कांग्रेस अब मजबूती से उनके साथ खड़ी नहीं है।
विकल्पों की तलाश
उत्तर प्रदेश में मुस्लिम राजनीति का बड़ा हिस्सा अब समाजवादी पार्टी, क्षेत्रीय दलों या नए राजनीतिक विकल्पों की ओर देख रहा है। कांग्रेस का संगठन न तो बूथ स्तर पर सक्रिय है और न ही उसके पास कोई करिश्माई नेतृत्व है, जो अल्पसंख्यक समाज को भरोसा दिला सके।
कांग्रेस के लिए चेतावनी
नसीमुद्दीन सिद्दीकी का जाना कांग्रेस के लिए केवल एक नेता का नुकसान नहीं, बल्कि यह एक राजनीतिक चेतावनी है। अगर पार्टी ने समय रहते मुस्लिम नेतृत्व को सम्मान, हिस्सेदारी और स्पष्ट राजनीतिक दिशा नहीं दी, तो आने वाले चुनावों में उसका जनाधार और सिकुड़ सकता है।
अब देखना यह है कि कांग्रेस इस सिलसिलेवार पलायन को सिर्फ़ “व्यक्तिगत फैसले” बताकर टालती है या आत्ममंथन कर जमीनी हकीकत को समझने की कोशिश करती है।

