पटना।बिहार विधानसभा चुनाव से ठीक पहले वक्फ अधिनियम को लेकर सियासत गरमा गई है। विवाद की चपेट में राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के नेता तेजस्वी यादव आ गए हैं। मामला तब तूल पकड़ गया जब राजद के विधान पार्षद कारी शोएब ने तेजस्वी यादव की मौजूदगी में एक जनसभा में कहा कि “अगर राजद सत्ता में आई तो सभी विधेयकों को ध्वस्त कर दिया जाएगा।”
इस बयान को भाजपा ने हाथों-हाथ लेते हुए राजद पर “सुप्रीम कोर्ट का अनादर” और “जंगलराज लौटाने की कोशिश” का आरोप लगाया। भाजपा नेताओं का कहना है कि राजद तुष्टिकरण की राजनीति कर रही है और इस बहस को जानबूझकर “शरिया बनाम संविधान” का रूप दिया जा रहा है।
राजद की दलील है कि वक्फ अधिनियम असंवैधानिक है और यह समुदायों के अधिकारों का हनन करता है। पार्टी का कहना है कि वह इस कानून को खत्म करने के लिए लोकतांत्रिक और संवैधानिक तरीके से संघर्ष जारी रखेगी।
केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू का पलटवार
कारी शोएब का वीडियो क्लिप साझा करते हुए केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने विपक्ष पर तीखा हमला किया। उन्होंने कहा,
“किसका इलाज करना है? ये जंगलराज के लक्षण हैं, जिन्हें कुचलना होगा। कांग्रेस और राजद न सुप्रीम कोर्ट का सम्मान करते हैं, न संसद का — वे खुलेआम लोकतंत्र का अपमान कर रहे हैं।”
रिजिजू ने विश्वास जताया कि बिहार की जनता राजद और कांग्रेस को करारा जवाब देगी।
विवाद की पृष्ठभूमि: वक्फ (संशोधन) अधिनियम, 2025
यह विवाद दरअसल अप्रैल 2025 में लागू वक्फ (संशोधन) अधिनियम से जुड़ा है, जो 1995 के मूल वक्फ कानून में कई बड़े बदलाव लाता है।
केंद्र सरकार का कहना है कि इस कानून का उद्देश्य वक्फ संपत्तियों के पारदर्शी प्रबंधन और जनकल्याणकारी उपयोग को सुनिश्चित करना है।
मुख्य प्रावधानों में शामिल हैं:
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वक्फ संपत्तियों का डिजिटलीकरण और भू-रिकॉर्ड से लिंकिंग,
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बोर्डों का नियमित ऑडिट,
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बोर्डों में महिलाओं, शिया, पश्मांदा, बोहरा, और यहाँ तक कि गैर-मुस्लिम प्रतिनिधियों का समावेश।
केंद्र का दावा है कि इससे वक्फ संपत्तियों की आमदनी को बेहतर तरीके से महिलाओं व वंचित तबकों के कल्याण में लगाया जा सकेगा।
हालाँकि, विपक्षी दलों ने इसे धार्मिक मामलों में केंद्र के हस्तक्षेप की कोशिश बताया था।
चुनावी समय और असर
यह पूरा विवाद ऐसे वक्त में उभरा है जब बिहार विधानसभा चुनाव नज़दीक हैं।
राज्य की 243 सीटों के लिए मतदान 6 और 11 नवंबर को दो चरणों में होगा, जबकि मतगणना 14 नवंबर को होगी।
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि वक्फ अधिनियम पर उठी यह बहस अब सिर्फ एक कानूनी मुद्दा नहीं रह गई — बल्कि यह धर्म, राजनीति और चुनावी रणनीति के त्रिकोण में तब्दील हो चुकी है।

