लेखक। अज़हर उमरी
(वरिष्ठ पत्रकार सामाजिक चिंतक)
भारत में जब भी कोई बड़ा प्रशासनिक अभियान चलता है, तो उसकी सबसे मजबूत कड़ी शिक्षक वर्ग को बनाया जाता है। चाहे चुनाव हों, पल्स पोलियो अभियान, मतदाता सूची पुनरीक्षण, सर्वेक्षण कार्य या फिर जनगणना—हर जिम्मेदारी सबसे पहले शिक्षकों के कंधों पर डाल दी जाती है। एक बार फिर जनगणना का कार्य शुरू होने जा रहा है और भीषण गर्मी के बीच शिक्षकों की ड्यूटी लगाई जा रही है। यह स्थिति केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं से जुड़ा विषय भी है।
मई-जून की चिलचिलाती धूप में जब तापमान 45 डिग्री के पार पहुंच जाता है, तब शिक्षक घर-घर जाकर आंकड़े जुटाने के लिए मजबूर होते हैं। हाथों में फॉर्म, कंधे पर बैग और माथे पर पसीना लिए वे गलियों, गांवों और दूरदराज़ इलाकों में घूमते हैं। कई बार उन्हें पीने का पानी तक नसीब नहीं होता, तो कहीं लोगों के असहयोग का सामना करना पड़ता है। इसके बावजूद वे अपनी जिम्मेदारी को पूरी निष्ठा से निभाते हैं।
शिक्षक का मूल कार्य शिक्षा देना है। बच्चों का भविष्य संवारना, उन्हें ज्ञान और संस्कार प्रदान करना उसकी प्राथमिक जिम्मेदारी होती है। लेकिन विडंबना यह है कि आज शिक्षक को पढ़ाने से अधिक गैर-शैक्षणिक कार्यों में लगा दिया जाता है। जनगणना जैसी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां प्रशासन के लिए आवश्यक हो सकती हैं, परंतु इसका सीधा प्रभाव विद्यालयों की पढ़ाई पर पड़ता है। जब शिक्षक कई दिनों तक स्कूल से बाहर रहेंगे, तो बच्चों की शिक्षा प्रभावित होना स्वाभाविक है।
तपती धूप में लगातार काम करने से शिक्षकों के स्वास्थ्य पर भी प्रतिकूल असर पड़ता है। हीट स्ट्रोक, डिहाइड्रेशन और थकावट जैसी समस्याएं आम हो जाती हैं। कई महिला शिक्षिकाओं को छोटे बच्चों और पारिवारिक जिम्मेदारियों के साथ यह कठिन ड्यूटी निभानी पड़ती है। वरिष्ठ आयु के शिक्षकों के लिए यह कार्य और भी चुनौतीपूर्ण हो जाता है।
सरकार और प्रशासन को चाहिए कि जनगणना जैसे कार्यों के लिए पर्याप्त सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं। शिक्षकों को सुरक्षित परिवहन, पीने के पानी, प्राथमिक चिकित्सा और उचित विश्राम की व्यवस्था मिलनी चाहिए। साथ ही तकनीक का अधिक उपयोग कर इस प्रक्रिया को सरल बनाया जा सकता है, ताकि शिक्षकों पर अनावश्यक बोझ कम हो।
समाज को भी यह समझना होगा कि शिक्षक केवल सरकारी कर्मचारी नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण की नींव हैं। यदि वही लगातार अतिरिक्त कार्यों के दबाव में रहेंगे, तो शिक्षा व्यवस्था कमजोर होगी। जनगणना देश के विकास के लिए आवश्यक है, लेकिन इसे मानवीय दृष्टिकोण और शिक्षकों के सम्मान के साथ संपन्न कराना भी उतना ही जरूरी है।
तपती धूप में जनगणना की ड्यूटी निभाते शिक्षक केवल आंकड़े नहीं जुटा रहे होते, बल्कि वे अपने कर्तव्य, धैर्य और समर्पण की मिसाल भी पेश कर रहे होते हैं।

