लेखक। अज़हर उमरी
(वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक)
कुछ लोग इतिहास में दर्ज होते हैं,
और कुछ लोग इतिहास को दिशा देते हैं।
डॉ. ज़ाकिर हुसैन उन्हीं में से थे—जिनके लिए सत्ता कभी शिखर नहीं रही, शिक्षा ही सब कुछ रही।
भारत के तीसरे राष्ट्रपति, ‘भारत रत्न’ से सम्मानित डॉ. ज़ाकिर हुसैन ने जब राष्ट्रपति भवन में कदम रखा, तब भी उनके भीतर का शिक्षक बाहर नहीं गया। उनके लिए राष्ट्रपति बनना उपलब्धि नहीं, जिम्मेदारी थी—और शिक्षा, जीवन भर की इबादत।
8 फ़रवरी 1897 को जन्मे डॉ. ज़ाकिर हुसैन उस दौर की पैदाइश थे, जब पढ़ाई किताबों तक सीमित नहीं थी, बल्कि किरदार गढ़ने का ज़रिया हुआ करती थी। वे मानते थे कि अगर शिक्षा इंसान को इंसान न बनाए, तो वह कितनी भी ऊँची डिग्री क्यों न दिला दे—वह अधूरी है।
आज के दौर में, जब बच्चे नंबरों के बोझ तले दबे हैं, जब शिक्षा का मतलब सिर्फ़ नौकरी बन गया है, तब डॉ. ज़ाकिर हुसैन की आवाज़ और ज़्यादा तेज़ सुनाई देती है—
“तालीम का मक़सद रोज़गार नहीं, किरदार होना चाहिए।”
जामिया मिल्लिया इस्लामिया उनके लिए सिर्फ़ एक संस्था नहीं थी, बल्कि एक सपना थी—ऐसा भारत, जहाँ शिक्षा मज़हब, जाति और वर्ग की दीवारों से ऊपर उठकर इंसान को जोड़ती हो। कठिन हालात में भी उन्होंने उस चिराग़ को बुझने नहीं दिया, क्योंकि उन्हें पता था—अगर शिक्षा ज़िंदा है, तो देश ज़िंदा है।
राष्ट्रपति रहते हुए भी उनकी सादगी मिसाल बनी। न तामझाम, न अहंकार। उनके शब्दों में वही अपनापन, वही शिक्षक की डांट और दुलार—जो किसी भी छात्र को बेहतर इंसान बना दे।
डॉ. ज़ाकिर हुसैन हमें यह सिखा गए कि असली महानता ऊँचे पद पर बैठने में नहीं, बल्कि झुककर समाज को उठाने में है।
कि राष्ट्र वही मजबूत होता है, जिसकी नींव शिक्षा और नैतिकता पर रखी गई हो।
आज उनकी जयंती पर सवाल हमसे है—
क्या हम शिक्षा को फिर से ज़मीर से जोड़ पाएँगे?
क्या हम बच्चों को इंसान बनाने की ज़िम्मेदारी निभा पाएँगे?
डॉ. ज़ाकिर हुसैन सिर्फ़ राष्ट्रपति नहीं थे—वह एक विचार थे।
और विचार कभी मरते नहीं।

