लेखक। तबस्सुम अब्बास
(शिक्षिका एवं सामाजिक चिंतक)
आज जब हर साल परीक्षाओं के दौरान नकल के मामले सामने आते हैं, तो समाज का एक बड़ा वर्ग तुरंत छात्रों को दोषी ठहराने लगता है। लेकिन सवाल यह है कि क्या नकल केवल छात्रों की नैतिक कमजोरी है, या इसके पीछे हमारा पूरा शिक्षा तंत्र जिम्मेदार है? सच्चाई यह है कि आज का एजुकेशन सिस्टम शिक्षा से ज़्यादा डिग्रियों को महत्व देता है, और यही सोच नकल जैसी प्रवृत्तियों को जन्म देती है।
हमारे समाज में पढ़ाई का मतलब समझ बनाना नहीं, बल्कि नंबर लाना बन चुका है। बचपन से ही बच्चों के मन में यह बात बैठा दी जाती है कि अच्छे अंक लाओ, तभी अच्छा स्कूल मिलेगा; डिग्री लो, तभी नौकरी मिलेगी; और सर्टिफिकेट होगा, तभी इज्जत मिलेगी। जब लक्ष्य केवल परिणाम बन जाए और प्रक्रिया महत्वहीन हो जाए, तो रास्ते में ईमानदारी अक्सर पीछे छूट जाती है।
परीक्षा प्रणाली भी इस समस्या को और गहरा करती है। एक-दो घंटे की परीक्षा में पूरे साल की क्षमता को आंकने की कोशिश की जाती है। रटने की क्षमता को बुद्धिमत्ता मान लिया जाता है, जबकि समझ, तर्क, रचनात्मकता और व्यावहारिक ज्ञान को हाशिए पर डाल दिया जाता है। ऐसे में कमजोर पृष्ठभूमि से आने वाला छात्र, जो न तो महंगे कोचिंग संस्थानों का सहारा ले सकता है और न निजी ट्यूशन का, खुद को असहाय महसूस करता है—और नकल उसे एकमात्र रास्ता दिखाई देती है।
दूसरी ओर, माता-पिता और समाज का दबाव भी कम खतरनाक नहीं है। “पास होना है, चाहे जैसे हो”, “फेल हो गए तो बदनामी होगी”—ऐसे वाक्य बच्चों को डर के माहौल में जीने पर मजबूर कर देते हैं। डर में पला छात्र ज्ञान अर्जित नहीं करता, बल्कि किसी भी तरह परीक्षा पार करने के तरीके खोजता है।
असल शिक्षा का उद्देश्य व्यक्ति को सोचने, सवाल करने और जीवन से जूझने के योग्य बनाना होता है। लेकिन जब शिक्षा को रोजगार की गारंटी से जोड़ दिया जाता है और डिग्री को योग्यता का पैमाना बना दिया जाता है, तो शिक्षा एक व्यापार बन जाती है और छात्र ग्राहक। ऐसे में नैतिक मूल्यों की बात केवल किताबों तक सिमट कर रह जाती है।
नकल की समस्या का समाधान केवल सख्त कानून, उड़नदस्ते या कैमरे नहीं हैं। इसका हल शिक्षा की सोच बदलने में है। मूल्यांकन प्रणाली को ऐसा बनाना होगा, जहां समझ और कौशल को महत्व मिले। छात्रों पर अंकों का बोझ कम किया जाए, व्यावहारिक शिक्षा को बढ़ावा मिले और असफलता को अपराध नहीं, सीख की प्रक्रिया माना जाए।
जब डिग्री से ज़्यादा ज्ञान को, और नंबरों से ज़्यादा समझ को महत्व मिलेगा, तब नकल अपने आप अप्रासंगिक हो जाएगी। क्योंकि जो छात्र सीखने के लिए पढ़ता है, उसे धोखे की ज़रूरत नहीं होती।
नकल छात्रों की नहीं, सिस्टम की हार है।
और जब तक हम इस सच्चाई को स्वीकार नहीं करेंगे, तब तक शिक्षा की आत्मा यूं ही घायल होती रहेगी।

