आगरा। ईद-उल-अज़हा इस्लाम का वह मुबारक त्योहार है जो हमें कुर्बानी, फ़रमांबरदारी और अल्लाह की मोहब्बत का सबसे बड़ा सबक देता है। यह दिन हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम और हज़रत इस्माईल अलैहिस्सलाम की उस अज़ीम कुर्बानी की याद दिलाता है, जिसमें एक बाप ने अल्लाह के हुक्म पर अपने बेटे को कुर्बान करने का इरादा किया और बेटे ने भी अल्लाह की रज़ा पर सर झुका दिया।
मौलाना अल्तमश रहमानी ने अपने बयान में कहा कि ईद-उल-अज़हा का असली मक़सद सिर्फ़ जानवर की कुर्बानी नहीं, बल्कि अपने अंदर की बुराइयों को खत्म करना है। अगर इंसान के अंदर घमंड, नफ़रत, झूठ और लालच मौजूद है, तो केवल रस्म निभा लेने से कुर्बानी की रूह हासिल नहीं होती।
उन्होंने कहा कि आज दुनिया में इंसानियत सबसे बड़े संकट से गुजर रही है। लोग एक-दूसरे से दूर होते जा रहे हैं, रिश्तों में मोहब्बत कम होती जा रही है और समाज में नफ़रत बढ़ रही है। ऐसे समय में ईद-उल-अज़हा हमें भाईचारे, इंसानियत और आपसी हमदर्दी का पैग़ाम देती है।
मौलाना ने कहा कि इस्लाम ने कुर्बानी को गरीबों और ज़रूरतमंदों के साथ जोड़ा है, ताकि समाज का हर व्यक्ति खुशी में शामिल हो सके। कुर्बानी का गोश्त गरीबों, यतीमों और जरूरतमंदों तक पहुंचाना इस त्योहार की अहम सुन्नत है।
उन्होंने नौजवानों से अपील करते हुए कहा कि वे ईद को केवल दिखावे और रस्म तक सीमित न रखें, बल्कि अपनी जिंदगी में सच्चाई, ईमानदारी और इंसानियत को अपनाएं। यही ईद-उल-अज़हा का असली संदेश है।
अंत में मौलाना अल्तमश रहमानी ने दुआ की कि अल्लाह तआला हम सबकी कुर्बानियों को कबूल फरमाए, मुल्क में अमन और भाईचारा कायम रखे और पूरी इंसानियत को मोहब्बत और इंसाफ़ के रास्ते पर चलने की तौफ़ीक़ अता करे। आमीन।

