रिपोर्ट एस मुनीर
अलीगढ़। अमीरुल मोमिनीन हज़रत अली अलैहिस्सलाम के फ़ज़ाइल व कमालात पर कुछ कहना या लिखना जितना आसान प्रतीत होता है, उतना ही कठिन भी है। इसकी वजह यह है कि हज़रत अली अ.स. फ़ज़ाइल का ऐसा बेक़रार समंदर हैं, जिसकी गहराई तक पहुँचना इंसान के लिए नामुमकिन है। इंसान जितना उसमें गोता लगाता है, उतने ही फ़ज़ाइल के मोती हासिल करता है।यह बात पीर-ए-तरीकत डॉ. मोहम्मद अब्बास नियाज़ी ने सर सैयद की सिद्दीक कॉलोनी स्थित ख़ानक़ाह नियाज़िया में अल-नियाज़ एजुकेशन एंड वेलफेयर फाउंडेशन की ओर से आयोजित जश्न-ए-मौलूद-ए-काबा के अवसर पर श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए कही।
डॉ. नियाज़ी ने कहा कि हज़रत अली अ.स. की महानता का अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि उनके दुश्मनों ने हसद में और दोस्तों ने दुश्मनों के डर से उनके फ़ज़ाइल छुपाए, और इन दोनों के बीच मशरिक़ से मगरिब तक फ़ज़ाइल की एक पूरी दुनिया आबाद हो गई।उन्होंने कहा कि अमीरुल मोमिनीन हज़रत अली अ.स. की विलादत 13 रजबुल मुरज्जब को ख़ाना-ए-काबा के अंदर हुई, जो इस्लामी इतिहास का एक अनोखा और महान वाक़िया है। आपके अलावा कोई भी काबा के भीतर पैदा नहीं हुआ। यही आपकी सबसे बड़ी फ़ज़ीलतों में से एक है हज़रत अली अ.स. का नाम अली, लक़ब हैदर और मुरतज़ा, कुनियत अबुल हसन और अबू तुराब है। आपके वालिद हज़रत अबू तालिब और वालिदा फातिमा बिन्त असद थीं। आप मां-बाप दोनों की तरफ़ से हाशमी थे।
पीर-ए-तरीकत ने कहा कि हज़रत अली अ.स. शजाअत, इल्म, इबादत और इंसाफ़ का मुकम्मल नमूना थे। मैदान-ए-जंग में शेर-ए-ख़ुदा और मस्जिद में ज़ाहिद-ए-शब-बेदार थे। आप फ़क़ीरों, मज़लूमों और ग़रीबों के मददगार थे। ख़िलाफ़त के दौर में बाज़ारों का निरीक्षण करना, इंसाफ़ क़ायम करना और आम आदमी की मदद करना आपकी दिनचर्या का हिस्सा था।
कार्यक्रम में बड़ी संख्या में अकीदतमंद मौजूद रहे। बाद नमाज़ अस्र महफ़िल-ए-मीलाद, बाद नमाज़ मग़रिब मनक़बत व ज़िक्र, तथा अंत में फ़ातिहा ख़्वानी और दस्तरख़्वान का आयोजन किया गया। देश में अमन-ओ-अमान के लिए विशेष दुआ की गई।

