“कानून के बिना प्राइवेट पब्लिशर्स पर रोक नहीं, छात्रों के बैग की पुलिसिंग अस्वीकार्य”
प्रयागराज। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण आदेश में स्पष्ट कर दिया है कि बिना किसी वैधानिक प्रावधान के प्राइवेट पब्लिशर्स को अपनी किताबें प्रकाशित, छापने, विज्ञापन करने या खुले बाजार में बेचने से नहीं रोका जा सकता। अदालत ने कहा कि कार्यपालिका के निर्देश मौलिक अधिकारों को ओवरराइड नहीं कर सकते।
यह टिप्पणी उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा परिषद द्वारा जारी 8 जनवरी 2026 की अधिसूचना (31 जनवरी को संशोधित) को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान की गई। अधिसूचना में प्रावधान था कि यदि कोई विद्यालय बिना अनुमति प्राइवेट पब्लिशर्स की किताबें इस्तेमाल करता पाया गया तो उसकी मान्यता निलंबित/निरस्त की जा सकती है और ₹5 लाख तक जुर्माना लगाया जा सकता है। संबंधित बुकसेलर्स के खिलाफ कार्रवाई का भी उल्लेख था।
न्यायमूर्ति नीरज तिवारी और न्यायमूर्ति गरिमा प्रसाद की खंडपीठ ने सुनवाई करते हुए कहा कि प्रथम दृष्टया ऐसा कोई कानून नहीं है जो प्राइवेट पब्लिशर्स को ओपन मार्केट में किताबें प्रकाशित या बेचने से रोकता हो। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि सिर्फ इसलिए किसी छात्र के बैग में “अनधिकृत” किताब मिलने पर संस्थान के खिलाफ जबरन कार्रवाई नहीं की जा सकती।
याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता राहुल सहाय ने दलील दी कि अधिसूचना भले प्रत्यक्ष प्रतिबंध न हो, लेकिन इसका प्रभाव “इनडायरेक्ट बैन” जैसा है, जो व्यापार करने के मौलिक अधिकार का उल्लंघन करता है।
राज्य सरकार ने तर्क दिया कि कुछ प्रकाशक निजी स्कूलों के साथ मिलीभगत कर अपनी किताबें बढ़ावा देते हैं। इस पर पीठ ने सवाल किया कि किस वैधानिक नियम के तहत किसी प्रकाशक को अपनी पुस्तकें बेचने या प्रचारित करने से रोका जा सकता है।
मामले की अगली सुनवाई निर्धारित की गई है।

