नई दिल्ली। फेफड़ों के कैंसर के खिलाफ लड़ाई में वैज्ञानिकों को एक बड़ी सफलता हाथ लगी है। एक नए अंतरराष्ट्रीय अध्ययन में शोधकर्ताओं ने रक्त में ऐसे जैविक संकेतकों (बायोमार्कर्स) की पहचान की है, जो बीमारी के निदान से पांच वर्ष से भी अधिक समय पहले फेफड़ों के कैंसर के जोखिम का संकेत दे सकते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह खोज भविष्य में कैंसर की शीघ्र पहचान और समय पर उपचार का मार्ग प्रशस्त कर सकती है।
प्रतिष्ठित वैज्ञानिक पत्रिका Cell में प्रकाशित अध्ययन के अनुसार, वैज्ञानिकों ने रक्त में मौजूद 14 विशिष्ट प्रोटीनों के एक ऐसे पैटर्न की पहचान की है, जो औसतन 5.6 वर्ष पहले यह अनुमान लगाने में सक्षम है कि किसी व्यक्ति को भविष्य में फेफड़ों का कैंसर होने की कितनी संभावना है।
भारत में बढ़ता खतरा
विशेषज्ञों के अनुसार भारत में फेफड़ों का कैंसर तेजी से बढ़ती सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती बनता जा रहा है। वर्ष 2015 में जहां इस बीमारी के लगभग 63,700 मामले सामने आए थे, वहीं 2025 तक यह संख्या 81,000 से अधिक होने का अनुमान है। चिंताजनक तथ्य यह है कि देश में 80 से 85 प्रतिशत मरीजों में कैंसर का पता तब चलता है, जब बीमारी काफी आगे बढ़ चुकी होती है।
जोखिम का आकलन, निदान नहीं
नई दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आयुर्वेद संस्थान के विकिरण कैंसर विशेषज्ञ डॉ. अभिषेक शंकर ने स्पष्ट किया कि इस रक्त परीक्षण को कैंसर की प्रत्यक्ष जांच नहीं माना जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि यह परीक्षण ट्यूमर का पता नहीं लगाता, बल्कि उन लोगों की पहचान करने में मदद करता है जिनमें भविष्य में फेफड़ों के कैंसर का जोखिम अधिक हो सकता है।
48 हजार लोगों के आंकड़ों का विश्लेषण
शोध के दौरान वैज्ञानिकों ने यूके बायोबैंक कार्यक्रम के 48,000 से अधिक प्रतिभागियों के रक्त नमूनों और स्वास्थ्य संबंधी आंकड़ों का अध्ययन किया। परिणामों से पता चला कि 14 प्रोटीनों के साथ उम्र, धूम्रपान का इतिहास और फेफड़ों की पुरानी बीमारियों जैसी जानकारियों को जोड़कर भविष्य के कैंसर जोखिम का अधिक सटीक अनुमान लगाया जा सकता है।
बाद में इस मॉडल की पुष्टि 2,000 से अधिक फेफड़ों के कैंसर रोगियों पर किए गए आठ अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों में भी हुई, जिससे इसकी विश्वसनीयता और मजबूत हुई।
प्रदूषण भी बढ़ा सकता है खतरा
अध्ययन में यह भी सामने आया कि ये जैविक संकेतक केवल धूम्रपान करने वालों में ही नहीं, बल्कि वायु प्रदूषण के सूक्ष्म कणों के लगातार संपर्क में रहने वाले लोगों में भी पाए गए। शोधकर्ताओं के अनुसार प्रदूषण, आनुवंशिक उत्परिवर्तन और शरीर में सूजन से जुड़े कारक ऐसे जैविक मार्गों को सक्रिय कर सकते हैं जो अंततः ट्यूमर के विकास का कारण बनते हैं।
भविष्य में बदल सकती है कैंसर जांच की तस्वीर
विशेषज्ञों का कहना है कि इस तकनीक को नियमित चिकित्सा अभ्यास में शामिल करने से पहले विभिन्न देशों और आबादी समूहों पर और व्यापक अध्ययन किए जाने की आवश्यकता है। हालांकि, यदि आगे के परीक्षण सफल रहते हैं तो आने वाले वर्षों में रक्त आधारित जोखिम विश्लेषण परीक्षण फेफड़ों के कैंसर की शुरुआती पहचान, निगरानी और रोकथाम में क्रांतिकारी भूमिका निभा सकते हैं।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि कैंसर से लड़ाई में सबसे बड़ा हथियार समय पर पहचान है, और यह नई खोज उसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकती है।

