नई दिल्ली । रोजगार और सामाजिक अधिकार अभियान द्वारा आयोजित यह सम्मेलन देश के सामने खड़े गहरे आर्थिक, सामाजिक और अंतरराष्ट्रीय संकटों को समग्र दृष्टिकोण से समझने और उनके समाधान के लिए एक वैकल्पिक दिशा प्रस्तुत करने का प्रयास है। इस सम्मेलन की विशेषता यह है कि इसमें देश के विभिन्न राज्यों से जमीनी स्तर पर काम करने वाली तबकाई, वर्गीय और मेहनतकश शक्तियाँ शामिल हुई हैं। ये वे संगठन और समूह हैं जो सामाजिक अधिकारों के लिए राजनीतिक स्तर पर संघर्ष कर रहे हैं।
इसके साथ ही सम्मेलन में ऐसे अर्थशास्त्री, सामाजिक एवं राजनीतिक कार्यकर्ता भी शामिल हुए हैं, जो राजनीतिक अर्थशास्त्र की गहरी समझ रखते हैं और उसे व्यवहार में लागू करने का अनुभव रखते हैं। इस प्रकार यह सम्मेलन सिद्धांत और व्यवहार के समन्वय (प्रैक्सिस) का एक मंच बन रहा है, जो देश पर मंडरा रही तानाशाही प्रवृत्तियों के खिलाफ लोकतांत्रिक संघर्षों को और मजबूती देगा।
अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य पर नजर डालें तो अमरीका-इजरायल द्वारा ईरान पर हमले, गाजा में जारी नरसंहार, लेबनान में हो रहे हमले और वेनेजुएला के राष्ट्रपति के अपहरण जैसी घटनाएँ यह दर्शाती हैं कि वैश्विक शक्ति संतुलन को अपने पक्ष में बनाए रखने के लिए अमरीका युद्ध, हिंसा और अस्थिरता को बढ़ावा दे रहा है। ऐसे हालात में भारत की विदेश नीति, ऊर्जा, कृषि और खाद्यान्न संकट को नए सिरे से समझने की आवश्यकता है।
कोई भी तानाशाही प्रवृत्ति वाली सरकार दुनिया में शांति और लोकतंत्र के पक्ष में खड़ी नहीं हो सकती। इसके विपरीत, ऐसी सरकारें अधिनायकवादी और विध्वंसक शक्तियों पर निर्भर हो जाती हैं। भारत की स्थिति भी कुछ हद तक इसी दिशा में जाती दिखाई देती है। आज़ादी के बाद से चली आ रही रणनीतिक स्वायत्तता की विदेश नीति को बहुपक्षीयता के नाम पर कमजोर कर दिया गया है, जिसके चलते भारत कई क्षेत्रों में स्वतंत्र और संप्रभु निर्णय लेने में बाधित हो रहा है।
देश के मेहनतकश वर्ग—विशेषकर अनुसूचित जातियाँ, अनुसूचित जनजातियाँ, अत्यंत पिछड़े वर्ग, पसमांदा मुसलमान और महिलाएँ—गंभीर संकट से गुजर रहे हैं। बेरोज़गारी अपने चरम पर है और शिक्षा, स्वास्थ्य, पेंशन तथा भूमिहीनों के लिए आवासीय भूमि से जुड़े मुद्दे लगातार गंभीर होते जा रहे हैं। महँगाई और बढ़ते शुल्क आम जनता की मुश्किलों को और बढ़ा रहे हैं।
अत्यंत पिछड़े वर्गों को उनके संवैधानिक प्रतिनिधित्व से वंचित किया जा रहा है। वहीं, 2011 की जनगणना के आधार पर प्रस्तावित परिसीमन जैसी नीतियाँ प्रतिनिधित्व के संतुलन को बिगाड़ने का खतरा पैदा करती हैं, जिससे पहले से ही हाशिए पर मौजूद समुदाय और अधिक पीछे धकेले जा सकते हैं। अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए विशेष बजटीय उप-योजनाएँ भी अपर्याप्त हैं, जबकि अन्य वंचित वर्गों के लिए कोई समर्पित बजटीय व्यवस्था नहीं है।
पर्यावरणीय संकट भी अत्यंत गंभीर होता जा रहा है। कारपोरेट घरानों द्वारा प्राकृतिक संसाधनों का दोहन जारी है, जिससे आर्थिक और क्षेत्रीय असमानताएँ बढ़ रही हैं। किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) नहीं मिल पा रहा है और श्रमिकों को आधुनिक प्रकार की बंधुआ श्रम व्यवस्था की ओर धकेला जा रहा है। माइक्रोफाइनेंस कंपनियाँ विशेष रूप से महिलाओं का आर्थिक शोषण कर रही हैं।
इन्हीं परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए रोजगार और सामाजिक अधिकार अभियान रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, पेंशन, भूमिहीनों को आवासीय भूमि का अधिकार और अत्यंत पिछड़े वर्गों के प्रतिनिधित्व की मांग को लेकर देशव्यापी अभियान चला रहा है। साथ ही, यह पूंजी के अनियंत्रित आवागमन पर नियंत्रण और विदेश नीति में रणनीतिक स्वायत्तता को पुनर्स्थापित करने की दिशा में भी प्रयासरत है।
इस सम्मेलन के माध्यम से अभियान अपने संघर्ष को और व्यापक तथा संगठित रूप देने का संकल्प लेता है। इस संदर्भ में देश के प्रबुद्ध जनों द्वारा लिए गए राजनीतिक और सामाजिक निर्णयों को रोजगार और सामाजिक अधिकार अभियान पूरी प्रतिबद्धता के साथ लागू करेगा।

