लेखक – अज़हर उमरी
(वरिष्ठ पत्रकार राजनीतिक विशेषज्ञ)
भारत की राजनीति में एक समुदाय ऐसा है जिसे हर चुनाव से पहले “रणनीति” कहा जाता है और चुनाव के बाद “संख्या”।
नाम है—मुसलमान।
राजनीतिक पार्टियां आज तक मुसलमानों को दो ही रूपों में देखती आई हैं:
या तो डर का प्रतीक, या वोट का गणित।
लेकिन कभी एक सवाल ईमानदारी से नहीं पूछा गया—
क्या हमने मुसलमान को नागरिक समझा?
एक कड़वा सच: मुसलमान घोषणापत्र पढ़ता नहीं, ज़िंदगी भुगतता है
घोषणापत्रों में योजनाएं चमकती हैं,
लेकिन मुस्लिम मोहल्लों में स्कूल बुझते हैं, अस्पताल दूर होते हैं और पुलिस चौकी डर पैदा करती है।
अगर कोई पार्टी खुद को “मुस्लिम हितैषी” कहती है,
तो उसे इफ्तार की दावत नहीं,
पिछले दस साल का हिसाब रखना होगा—
- किस कानून ने मुसलमान को सुरक्षित किया?
- किस नीति ने उसके बच्चे को आगे बढ़ाया?
- किस फैसले ने उसे शक की नज़र से मुक्त किया?
राजनीतिक दलों के लिए असहज सवाल
क्या किसी पार्टी ने यह स्वीकार किया कि
मुसलमान को नौकरी में शक,
मकान में भेदभाव,
और न्याय में देर मिलती है?
अगर हाँ—तो उसका समाधान क्या था?
अगर नहीं—तो चुप्पी किसकी रणनीति थी?
मुसलमान का सबसे बड़ा अपराध: सवाल पूछना
आज का मुसलमान नारे से नहीं डरता,
वह रिपोर्ट मांगता है।
- कितने मुस्लिम युवाओं को सरकारी नौकरियों में स्थान मिला?
- कितनी योजनाएं ज़मीन तक पहुँचीं?
- कितनी बार पार्टी नेतृत्व ने मुसलमानों को सिर्फ भीड़ नहीं, नीति-निर्माता माना?
प्रतिनिधित्व का झूठा आईना
राजनीतिक दल मुसलमान को मंच पर खड़ा करते हैं,
लेकिन टेबल से दूर रखते हैं।
मुस्लिम चेहरे दिखाए जाते हैं,
मगर फाइलों पर दस्तख़त किसी और के होते हैं।
यह प्रतिनिधित्व नहीं,
राजनीतिक सजावट है।
यह चेतावनी नहीं, ऐलान है
मुसलमान अब “कम नुकसान” की राजनीति नहीं करेगा।
अब वह पूछेगा—
“आपने हमें रोका क्या नहीं—
यह बताइए आपने हमें बढ़ाया क्या?”
जो पार्टी इस सवाल से घबराएगी,
वही भविष्य में अप्रासंगिक होगी।
आख़िरी बात—जो मीटिंग में बेचैनी पैदा करेगी
अगर कोई पार्टी आज यह दावा करती है कि
“मुसलमान हमारे साथ हैं”
तो उसे यह भी बताना होगा—
“हम मुसलमानों के साथ कब थे?”
क्योंकि
वोटर अब भावनात्मक नहीं, ऐतिहासिक हिसाब चाहता है।

