विनोद मिश्रा
बांदा। भाजपा अपने संगठन की सियासत में इन दिनों ज़्यादा चर्चा में हैं ! इसके केंद्र में है जिलाध्यक्ष कल्लू सिंह राजपूत। अपनी ताजपोशी के कुछ शुरुवाती महीने के बाद ही”आलोचनाओं के शिकंजे में जकड़ते” से जा रहे है ! आम कार्यकर्ता से लेकर अधिकांश पदाधिकारी तक यह “दर्द भरा फिल्मी नगमा” गुनगुना रहें हैं “‘क्या से क्या हो गया, बेवफ़ा तेरे प्यार में’! वजह है उनकी बदलती “अहंकारी कार्यशैली” जिस कारण जनता से दूरी बढ़ रही है? पार्टी के भीतर से लेकर आम कार्यकर्ताओं और स्थानीय नागरिकों के बीच सवाल उठ रहे हैं कि आखिर क्यों “कल्लू सिंह अब पहले जैसे सहज, सुलभ और संवेदनशील” नहीं रहे ?
सूत्रों की सही मानें तो इनकी तुलना “जो रहीम ओछो बढ़ै,तौ अति ही इतराय,प्यादे सों फरजी भयो,टेढ़ो टेढ़ो जाय” के उदाहरण से होने लगी है ?
उनका संपर्क “वास्तविकता के राजनीतिक धरातल” पर फरियादियों और मीडिया से भी ‘बेहद सीमित’ सा हो गया है ! आम जन के फोन करने पर “घंटी घनघनाती है,पर रिसीव” नहीं होती! कभी कोई करीबी “भक्त” फोन उठाता है तो जवाब मिलता है कि “साहब मीटिंग में हैं या व्यस्त हैं।” पार्टी सूत्र बताते हैं कि एक समय था जब “कल्लू सिंह राजपूत को मिलनसार, संवेदनशील और जमीनी नेता” माना जाता था। वे हर छोटे-बड़े कार्यकर्ताओं की सुनते थे, लेकिन “अब उनके व्यवहार में बदलाव” दिखाई देने लगा है, जिसे कार्यकर्ता “अहंकार” के रूप में देख रहे हैं ?
भाजपा की राजनीति में रूचि रखने वालों का कहना है कि भाजपा जैसी संगठन आधारित पार्टी के जिलाध्यक्ष को हर समय जनता और कार्यकर्ताओं के बीच रहना चाहिए।“नेता का कर्तव्य जनता की सुनवाई करना है,न कि “मोबाइल स्विच ऑफ रखना,” यह जनता की “सीधी नाराज़गी का मूल कारण” माना जा रहा है ! लोग “तंज कसते हैं “प्रभुता पाय काहि मद नाहीं” मतलब सत्ता या पद मिलने पर व्यक्ति में गर्व आना स्वाभाविक है,पर राजनीति में गर्व नहीं, विनम्रता टिकाऊ होती है।
जब इस मामले की सच्चाई जानने के लिए खबर लिखने से पूर्व हमने खुद फ़ोन और व्हाट्सअप पर संपर्क का प्रयास किया,तो सामने वही तस्वीर आई जिसकी चर्चा जनता में है। पंद्रह दिनों में लगभग रोजाना दो बार फोन किए,पर कोई कॉल रिसीव नहीं हुई। यहां तक कि व्हाट्सअप पर संदेशों का भी कोई जवाब नहीं मिला। इससे स्पष्ट सा होता है कि जिलाध्यक्ष इस वक्त जनता से संवाद के दायरे से दूर हैं,इससे पार्टी की जमीनी पकड़ कमजोर होती दिख रही है ?
पार्टीजनों का मानना है कि “कल्लू सिंह राजपूत जैसे जमीनी नेता के लिए जनता से दूरी “खतरनाक अहंकारी संकेत” है ! भाजपा का आधार कार्यकर्ता हैं,और कार्यकर्ता की नाराज़गी किसी भी नेता के भविष्य को प्रभावित कर सकती है।” वे यह भी मानते हैं कि “निंदक को पास रखना राजनीति की सबसे बड़ी कला “‘।“निंदक नियरे रखिए,आंगन कुटी छवाय” यह संत परंपरा का ज्ञान आज भी उतना ही प्रासंगिक है।
अन्यथा की स्थिति में आलोचना के बीच और दूर होते चले जाएंगे ?
कल्लू सिंह राजपूत को यह समझना होगा कि सत्ता और संगठन का असली बल जनता और कार्यकर्ता हैं। यदि उन्होंने समय रहते अपने व्यवहार और शैली में सुधार किया, तो “लंबी राजनीतिक यात्रा” संभव है। वरना कथित तौर पर उनके चाल चरित्र और चेहरे में जो बदलाव आया है वह संगठन एवं स्वयं हित में नहीं है!

