लेखक। अज़हर उमरी (वरिष्ठ पत्रकार)
भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में वर्ष 1952 केवल पहले आम चुनाव का वर्ष नहीं था, बल्कि यह सामाजिक न्याय की दिशा में एक गहरे आत्ममंथन का क्षण भी था। इसी चुनाव में संविधान निर्माता डॉ. भीमराव अम्बेडकर स्वयं चुनाव हार गए, जबकि उन्हीं के संघर्ष और संविधान में दिए गए अधिकारों के कारण एक अन्य दलित नेता बोरकर आरक्षित सीट से चुनाव जीत गए।
चुनाव जीतने के बाद बोरकर बाबासाहब से मिलने पहुँचे। प्रसन्नता से भरे स्वर में उन्होंने कहा कि वे चुनाव जीत गए हैं और बहुत खुश हैं। बाबासाहब ने सहज भाव से पूछा—
“अब क्या करोगे? तुम्हारा उद्देश्य क्या होगा?”
बोरकर का उत्तर चौंकाने वाला था—
“जो मेरी पार्टी कहेगी, वही करूँगा।”
बाबासाहब ने अगला प्रश्न किया—
“तुम सामान्य सीट से जीते हो या आरक्षित सीट से?”
उत्तर मिला—
“आरक्षित सीट से, जो आपके संविधान और आपके संघर्ष की देन है।”
बाबासाहब ने उन्हें चाय पिलाई और सम्मान के साथ विदा किया। लेकिन उनके जाने के बाद बाबासाहब मुस्कुरा रहे थे। जब नानकचंद रत्तू ने इसका कारण पूछा, तो बाबासाहब ने जो कहा, वह आज भी हमारे लोकतंत्र पर एक कठोर टिप्पणी है—
“बोरकर चुनाव तो जीत गया, लेकिन वह अपने समाज का प्रतिनिधि नहीं बना।
वह पार्टी का हरिजन बन गया है।”
डॉ. अम्बेडकर का यह कथन केवल एक व्यक्ति पर टिप्पणी नहीं था, बल्कि उस प्रवृत्ति की पहचान थी, जिसमें वंचित समाज से आए प्रतिनिधि सत्ता की सीढ़ी तो चढ़ जाते हैं, लेकिन अपने समाज की आवाज़ बनना भूल जाते हैं।
आज, सात दशक बाद, यह प्रश्न और भी प्रासंगिक हो गया है।
क्या हमारे दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यक सांसद-विधायक वास्तव में अपने समाज का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं?
या वे केवल पार्टी के आदेशों का पालन करने वाले “अनुशासित नेता” बनकर रह गए हैं?
आरक्षण का उद्देश्य सत्ता में भागीदारी था, न कि आत्मसमर्पण।
प्रतिनिधित्व का अर्थ था—
अन्याय के खिलाफ बोलना,
शोषण का प्रतिरोध करना,
और समाज को ऊपर उठाने की दिशा में नीतिगत हस्तक्षेप करना।
लेकिन दुर्भाग्यवश आज स्थिति यह है कि समाज के भीतर ही दलाल वर्ग पैदा हो गया है
जो स्वयं तो मंत्री, सांसद या विधायक बन जाते हैं,
लेकिन अपने समाज को केवल वोट बैंक बनाए रखते हैं।
डॉ. अम्बेडकर ने संविधान देकर रास्ता दिखाया था, लेकिन उन्होंने चेतावनी भी दी थी कि
यदि सामाजिक चेतना नहीं होगी, तो राजनीतिक अधिकार खोखले हो जाएँगे।
1952 में कही गई उनकी बात आज भी उतनी ही सच है—
प्रतिनिधि वही है जो समाज की आवाज़ बने,
न कि वह जो सत्ता के गलियारों में चुप्पी की कीमत पर अपनी कुर्सी सुरक्षित रखे।
लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने से नहीं चलता,
वह जिम्मेदारी निभाने से जीवित रहता है।

