मुस्लिम वोट बैंक में सेंध की कोशिश, 149 सीटों पर दांव से तृणमूल की चिंता बढ़ी
कोलकाता | TIMES OF TAJ
पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक बार फिर हलचल तेज हो गई है। ममता बनर्जी का “खेला होबे” नारा इस बार उन्हीं की पार्टी तृणमूल कांग्रेस के लिए चुनौती बनता नजर आ रहा है। राज्य में असदुद्दीन ओवैसी की ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन और हुमायूं कबीर की आम जनता उन्नयन पार्टी के बीच हुआ गठजोड़ सियासी समीकरणों को बदलने की क्षमता रखता है।
यह गठबंधन सीधे तौर पर उस मुस्लिम वोट बैंक को साधने की कोशिश कर रहा है, जो 2011 से अब तक तृणमूल कांग्रेस की सबसे बड़ी ताकत रहा है। ऐसे में राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि यह सिर्फ चुनावी तालमेल नहीं, बल्कि एक आक्रामक रणनीति है, जिसका मकसद सत्ता के समीकरणों को हिलाना है।
मौजूदा परिस्थितियों में तृणमूल कांग्रेस पहले से ही दबाव में है। मतदाता सूची के गहन पुनरीक्षण के दौरान संदिग्ध नामों को हटाए जाने की प्रक्रिया ने पार्टी के आधार पर असर डाला है। इसी बीच ओवैसी और कबीर का गठजोड़ उसी जमीन पर अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रहा है, जहां तृणमूल की पकड़ कमजोर पड़ती दिख रही है।
गौरतलब है कि हुमायूं कबीर कभी तृणमूल कांग्रेस के करीबी माने जाते थे। उनका पार्टी से अलग होना और अब 149 सीटों पर उम्मीदवार उतारने की घोषणा करना इस बात का संकेत है कि यह गठबंधन केवल उपस्थिति दर्ज कराने तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि सीधी टक्कर देने की रणनीति पर काम कर रहा है। खासकर मुर्शिदाबाद और आसपास के इलाकों में कबीर की मजबूत पकड़ को देखते हुए इस गठजोड़ को हल्के में नहीं लिया जा सकता।
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा असर तृणमूल के पारंपरिक वोट बैंक पर पड़ सकता है। ओवैसी और कबीर दोनों ही खुद को मुस्लिम समुदाय की आवाज के तौर पर पेश कर रहे हैं और तृणमूल पर उपेक्षा के आरोप लगा रहे हैं। यदि यह रणनीति सफल होती है, तो ममता बनर्जी के लिए यह बड़ा राजनीतिक झटका साबित हो सकता है।
दूसरी ओर, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने इस गठजोड़ पर तीखा हमला बोला है और ओवैसी को भाजपा का अप्रत्यक्ष सहयोगी बताया है। कांग्रेस का कहना है कि इस तरह के गठबंधन विपक्षी वोटों का बंटवारा कर भारतीय जनता पार्टी को फायदा पहुंचा सकते हैं।
वहीं, वाम दलों और अन्य विपक्षी गठबंधनों के बीच सीट बंटवारे को लेकर अब तक सहमति नहीं बन पाई है, जिससे विपक्ष बिखरा हुआ नजर आ रहा है। कांग्रेस का अकेले चुनाव लड़ने का फैसला भी इस बिखराव को और बढ़ाता है।
हालांकि, ओवैसी की पार्टी के सामने भाषा और क्षेत्रीय पहचान की चुनौती भी बनी हुई है। पश्चिम बंगाल के अधिकांश मुस्लिम मतदाता बांग्ला भाषी हैं, जबकि ओवैसी की पहचान उर्दू भाषी राजनीति से जुड़ी रही है। ऐसे में स्थानीय चेहरों पर दांव लगाना इस गठबंधन के लिए निर्णायक साबित हो सकता है।
फिलहाल, नजर इस बात पर टिकी है कि यह नया गठजोड़ सिर्फ सियासी शोर बनकर रह जाता है या वास्तव में बंगाल की सत्ता के समीकरण बदल देता है। इतना तय है कि इस बार पश्चिम बंगाल का चुनाव पहले से कहीं ज्यादा दिलचस्प और मुकाबलेदार होने वाला है।

