इस्लामी इतिहास की सबसे रूहानी और चमत्कारिक घटनाओं में इसरा व मेराज का वाक़या एक अद्वितीय स्थान रखता है। यह वह रात है जब अल्लाह तआला ने अपने प्यारे हबीब, नबी-ए-करीम हज़रत मुहम्मद ﷺ को ऐसी यात्रा कराई, जो इंसानी समझ और भौतिक सीमाओं से परे है।
इसरा और मेराज का अर्थ
इसरा (Al-Isra) उस पवित्र यात्रा को कहा जाता है, जिसमें नबी-ए-करीम ﷺ को एक ही रात में मक्का मुअज़्ज़मा से बैत-अल-मक़दिस (मस्जिद अल-अक़्सा) तक ले जाया गया।
इसके बाद मेराज (Al-Mi‘raj) का सफ़र हुआ, जिसमें आप ﷺ बैत-अल-मक़दिस से आसमानों, सिदरतुल मुन्तहा और लाँ-मकाँ तक पहुँचे۔
यह पूरा सफ़र बा-हुक्म-ए-इलाही हुआ और इसकी गवाही खुद क़ुरआन-ए-पाक देता है।
बुराक़: नूरानी सवारी
इस महान यात्रा के लिए अल्लाह ने अपने रसूल ﷺ को एक ख़ास और नूरानी सवारी अता की, जिसका नाम “बुराक़” था।
बुराक़ न ज़मीन की सवारी थी और न आसमान की—बल्कि वह रफ्तार, ताक़त और नूर का ऐसा संगम थी, जिसकी मिसाल इंसानी दुनिया में नहीं मिलती।
रिवायतों के अनुसार, जब नबी-ए-करीम ﷺ बैत-अल-मक़दिस (येरुशलम) पहुँचे, तो आपने बुराक़ को एक दीवार के पास बाँधा या ठहराया। यही दीवार आज “हाअइत-अल-बुराक़” (Buraq Wall) के नाम से जानी जाती है।
मस्जिद अल-बुराक़: इतिहास की गवाही
उसी ऐतिहासिक मुक़ाम के क़रीब एक छोटी लेकिन बेहद अहम मस्जिद स्थित है, जिसे “मस्जिद अल-बुराक़” कहा जाता है।
यह मस्जिद हरम-ए-मस्जिद अल-अक़्सा का अभिन्न हिस्सा है।
मस्जिद की बाहरी दीवार पर लगी शिलालेख के अनुसार,
यह मस्जिद ममलूक काल (707–797 हिजरी / 1307–1396 ईस्वी) में तामीर की गई थी—यानी आज से लगभग 700 साल पहले।
शिलालेख पर बना हिलाल और सितारे का निशान इसके इस्लामी इतिहास और पहचान को स्पष्ट करता है।
मुसलमानों के लिए अहमियत
मस्जिद अल-अक़्सा और उससे जुड़ा हर इलाका मुसलमानों के लिए बेहद मुक़द्दस है।
मक्का और मदीना के बाद यह इस्लाम का तीसरा सबसे पवित्र स्थल है।
इसरा व मेराज की वजह से इस मुक़ाम की रूहानी हैसियत और भी बढ़ जाती है।
27 रजब: याद, पैग़ाम और सबक़
हर साल 27 रजब की रात मुसलमान दुनिया भर में इसरा व मेराज की याद मनाते हैं।
यह रात हमें याद दिलाती है कि—
अल्लाह की क़ुदरत हर चीज़ पर क़ादिर है
नबी-ए-करीम ﷺ का मक़ाम तमाम मख़लूक़ से ऊँचा है
नमाज़ जैसी इबादत इसी रात उम्मत को तोहफ़े में मिली
इसरा व मेराज सिर्फ़ एक ऐतिहासिक घटना नहीं, बल्कि ईमान, यक़ीन और रूहानियत का पैग़ाम है।
बुराक़، मस्जिद अल-बुराक़ और मस्जिद अल-अक़्सा—ये सब हमें याद दिलाते हैं कि यह धरती सिर्फ़ सियासत का मैदान नहीं, बल्कि नबियों के क़दमों से पाक एक मुक़द्दस अमानत है।

