ब्राह्मण विधायकों की बैठक से बढ़ी सियासी बेचैनी
विश्लेषण | अज़हर उमरी
उत्तर प्रदेश की राजनीति में इन दिनों जो हलचल दिखाई दे रही है, वह सिर्फ़ एक बैठक या भोज तक सीमित नहीं है। 23 दिसंबर को लखनऊ में बीजेपी के ब्राह्मण विधायकों की बैठक, फिर 24 दिसंबर को यूपी बीजेपी अध्यक्ष पंकज चौधरी की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से दिल्ली में मुलाकात, और इसके बाद 25 दिसंबर की देर शाम बैठक में शामिल विधायकों को जारी अल्टीमेटम—इन घटनाओं की कड़ी ने भाजपा के भीतर चल रहे जातीय संतुलन के संकट को उजागर कर दिया है।
अब हालात यह हैं कि योगी सरकार की इंटेलिजेंस एजेंसियाँ यह पता लगाने में जुटी हैं कि कथित ‘बाटी-चोखा पार्टी’ के पीछे असली रणनीतिक दिमाग किसका था। सवाल सिर्फ़ एक भोज का नहीं, बल्कि उस संदेश का है, जो पार्टी के भीतर और बाहर दोनों जगह गया।
पार्टी लाइन बनाम जमीनी राजनीति
यूपी बीजेपी अध्यक्ष पंकज चौधरी ने साफ़ शब्दों में कहा कि परिवार या वर्ग विशेष के आधार पर राजनीतिक जुटान पार्टी की संवैधानिक परंपराओं के खिलाफ है। उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि भविष्य में इस तरह के किसी आयोजन पर कार्रवाई की जाएगी।
लेकिन इसी मुद्दे पर पार्टी के भीतर मतभेद भी खुलकर सामने आए। जब यूपी के डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य से इस बैठक को लेकर सवाल किया गया, तो उन्होंने इसे सामान्य राजनीतिक मेल-मुलाकात बताते हुए कहा कि विधानसभा सत्र के दौरान विधायक एक-दूसरे से मिलते रहते हैं, इसे जातीय चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए।
यही विरोधाभास भाजपा के भीतर असहजता की असली तस्वीर पेश करता है।
शक्ति प्रदर्शन या प्रतिक्रिया?
ब्राह्मण विधायकों की इस बैठक को केवल एक सामाजिक आयोजन मानना अधूरा विश्लेषण होगा। इसे शक्ति प्रदर्शन इसलिए भी कहा जा रहा है क्योंकि इसी साल अगस्त में ठाकुर और कुर्मी विधायकों की इसी तरह की जुटान हो चुकी है।
- ठाकुर विधायकों की पहली बैठक होटल क्लार्क अवध में एक जन्मदिन समारोह के बहाने हुई
- इसके बाद कल्याण सिंह और अवंतीबाई लोधी के नाम पर लोध नेताओं की जुटान
- फिर जन्मदिन आयोजन के बहाने कुर्मी नेताओं की बैठक
- और हाल ही में शीतकालीन सत्र के दौरान कुशीनगर विधायक के सरकारी आवास पर ब्राह्मण नेताओं का भोज
गौर करने वाली बात यह है कि यदि शुरुआती बैठकों पर पार्टी हाईकमान सख़्ती दिखाता, तो शायद आज हालात यहाँ तक न पहुँचते। उस समय प्रदेश अध्यक्ष भूपेंद्र चौधरी थे, लेकिन पार्टी ने इन संकेतों को हल्के में लिया।
2024 का झटका और 2027 की चिंता
भाजपा के भीतर इस उथल-पुथल की जड़ें 2024 लोकसभा चुनावों में यूपी में मिले झटके से जुड़ी हैं। पार्टी के आकलन में सामने आया कि विपक्ष के PDA (पिछड़ा–दलित–अल्पसंख्यक) कार्ड के कारण खासकर ओबीसी और कुर्मी वोटर भाजपा से खिसक गए।
इसी वजह से भाजपा में इन वर्गों को फिर से साधने की कोशिशें तेज़ हुईं। लेकिन इसका दूसरा पहलू यह है कि सवर्ण तबकों—खासतौर पर ब्राह्मणों—को यह महसूस होने लगा कि उनकी राजनीतिक अहमियत घट रही है। यही भावना अब बैठकों और शक्ति-प्रदर्शनों के रूप में सामने आ रही है।
विपक्ष की रणनीति और भाजपा की दुविधा
विपक्ष के लिए यह स्थिति एक अवसर बनती जा रही है। हाल के बिहार चुनाव नतीजों से सबक लेते हुए विपक्षी दल दलित और ओबीसी पर फोकस के साथ-साथ सवर्ण असंतोष को भुनाने की रणनीति पर काम कर रहे हैं।
कांग्रेस प्रवक्ता सुरेंद्र राजपूत ने भाजपा पर आरोप लगाया कि वह हमेशा जाति और धर्म के आधार पर विभाजनकारी राजनीति करती रही है। उन्होंने कहा कि ठाकुर विधायकों की बैठक भाजपा को स्वीकार्य है, लेकिन ब्राह्मण विधायकों को चेतावनी दी जाती है। उनके अनुसार ब्राह्मण भाजपा विधायकों को न तो सम्मान मिल रहा है और न ही राजनीतिक भरोसा।
संख्या जो सियासत बताती है
उत्तर प्रदेश में भाजपा के जातीय आंकड़े भी इस बेचैनी को समझने में मदद करते हैं:
- 258 भाजपा विधायक
- 84 ओबीसी
- 59 अनुसूचित जाति
- 45 ठाकुर
- 42 ब्राह्मण
- 28 अन्य उच्च जातियाँ
- 79 भाजपा एमएलसी
- 26 ओबीसी
- 23 ठाकुर
- 14 ब्राह्मण
- 2 अनुसूचित जाति
- 2 मुस्लिम
- 12 अन्य उच्च जातियाँ
दिसंबर 2021 में भाजपा को यह एहसास हो चुका था कि ब्राह्मण समुदाय में असंतोष पनप रहा है। यही वजह थी कि 2022 विधानसभा चुनाव से पहले ब्राह्मणों को साधने के लिए चार सदस्यीय समिति का गठन किया गया था।
आज भाजपा जिस मोड़ पर खड़ी है, वहाँ उसकी सबसे बड़ी चुनौती जातीय संतुलन और कोर वोटर की राजनीति को साधने की है। पार्टी अब तक यह मानती रही कि सवर्ण उसका स्थायी आधार हैं, लेकिन हालिया घटनाएँ बताती हैं कि यह भरोसा कमजोर पड़ रहा है।
अगर भाजपा इस असंतोष को सिर्फ़ अनुशासन का मामला मानकर टालती रही, तो 2027 की राह और मुश्किल हो सकती है।
यह सिर्फ़ बैठकों का विवाद नहीं, बल्कि सत्ता, प्रतिनिधित्व और सम्मान की उस राजनीति का संकेत है, जिसे नज़रअंदाज़ करना अब भाजपा के लिए आसान नहीं रहेगा।

