ढाका । बांग्लादेश के हालिया आम चुनावों के नतीजों ने सोशल मीडिया पर उस वक्त भ्रम की स्थिति पैदा कर दी, जब “बीजेपी” के एक सीट जीतने की खबर सामने आई। कई लोगों ने इसे भारत की सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी से जोड़ दिया, जबकि वास्तविकता इससे अलग है।
दरअसल, यहां जिस बीजेपी ने सीट जीती है, वह बांग्लादेश की बांग्लादेश जातीय पार्टी है, जिसका संक्षिप्त नाम भारत की पार्टी से मिलता-जुलता है।
बीएनपी की शानदार वापसी
चुनाव में मुख्य जीत बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) के खाते में गई, जिसने 209 सीटें जीतकर करीब दो दशकों बाद सत्ता में वापसी की है। पार्टी के शीर्ष नेता तारिक रहमान के अगले प्रधानमंत्री बनने की संभावना जताई जा रही है।
बीएनपी के सहयोगी दलों ने कुल 4 सीटें जीतीं, जिससे गठबंधन की कुल संख्या 212 तक पहुंच गई।
भोला-1 सीट पर पार्थो की जीत
बांग्लादेश जातीय पार्टी को केवल एक सीट—भोला-1 (सदर) निर्वाचन क्षेत्र—में सफलता मिली। पार्टी प्रमुख अंदलीव रहमान पार्थो ने लगभग 30,000 वोटों के अंतर से जीत दर्ज की।
आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार:
- पार्थो को 1,05,543 वोट मिले
- प्रतिद्वंद्वी जमात-ए-इस्लामी के नजरुल इस्लाम को 75,337 वोट प्राप्त हुए
युवा नेतृत्व और विरासत
20 अप्रैल 1974 को जन्मे पार्थो बांग्लादेश की राजनीति के युवा चेहरों में गिने जाते हैं। 2008 में पहली बार जीत दर्ज कर वे सबसे युवा सांसदों में शामिल हुए थे।
उनके पिता नाज़िउर रहमान मंज़ूर स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे और बाद में मंत्री तथा ढाका के मेयर भी रहे। उन्होंने 2001 में बांग्लादेश जातीय पार्टी की स्थापना की थी।
चुनावी वादे
इन चुनावों को शेख हसीना के सत्ता से हटने के बाद पहली बड़ी राजनीतिक परीक्षा माना जा रहा था। प्रचार के दौरान पार्थो ने अपने क्षेत्र को “तिलोत्तमा” यानी आधुनिक शहर में बदलने का वादा किया।
उन्होंने भोला-बरिशाल पुल, मेडिकल कॉलेज और घर-घर गैस कनेक्शन उपलब्ध कराने जैसे विकास कार्यों को प्राथमिकता देने की बात कही।
बांग्लादेश में “बीजेपी” की जीत को लेकर जो भ्रम फैला, वह केवल नाम की समानता के कारण था। वास्तविकता यह है कि यह जीत बांग्लादेश की एक क्षेत्रीय सहयोगी पार्टी की है, जबकि सत्ता की बागडोर बीएनपी के हाथ में जाती दिख रही है।

