लेखक – अज़हर उमरी, वरिष्ठ पत्रकार
हर साल 14 फरवरी को दुनियाभर में वेलेंटाइन डे धूमधाम से मनाया जाता है। यह दिन प्रेम और स्नेह के भाव को व्यक्त करने का प्रतीक माना जाता है। युवा वर्ग विशेष रूप से इस दिन को उत्साह और जश्न के साथ मनाता है। लेकिन इस्लामी दृष्टिकोण से वेलेंटाइन डे को देखने पर कई महत्वपूर्ण सवाल और परंपरागत मूल्य सामने आते हैं।
इस्लाम जीवन की हर दिशा में स्पष्ट मार्गदर्शन देता है—भले ही वह इबादत हो, सामाजिक व्यवहार हो या पारिवारिक संबंध। प्रेम को इस्लाम ने कभी नकारा नहीं; बल्कि इसे पवित्र, जिम्मेदार और मर्यादित भावना माना गया है। कुरआन और हदीस में माता-पिता, भाई-बहन, जीवनसाथी और पूरे मानव समाज के प्रति प्रेम, करुणा और सम्मान को सर्वोच्च स्थान दिया गया है।
वेलेंटाइन डे की उत्पत्ति पश्चिमी संस्कृति से हुई है और इसका स्वरूप अक्सर रोमांटिक संबंधों के सार्वजनिक प्रदर्शन पर केंद्रित रहता है। जबकि इस्लाम में स्त्री-पुरुष संबंधों को केवल निकाह (विवाह) और सामाजिक जिम्मेदारी के दायरे में देखा जाता है। इसका उद्देश्य न केवल प्रेम को सम्मान देना है, बल्कि उसे समाज और धर्म के नियमों के अनुरूप मर्यादित रखना भी है।
कुछ इस्लामी विद्वान मानते हैं कि गैर-इस्लामी परंपराओं की अंधानुकरण से बचना चाहिए और अपने धार्मिक मूल्यों को प्राथमिकता देनी चाहिए। वहीं, कई लोग यह भी मानते हैं कि यदि यह दिन प्रेम, सम्मान और सकारात्मक संदेश देता है, और इसमें अनैतिक तत्व नहीं हैं, तो इसे सामाजिक सद्भावना के रूप में देखा जा सकता है।
मूल बात यह है कि प्रेम को केवल एक दिन तक सीमित न रखा जाए, बल्कि उसे जीवन भर मर्यादा, ईमानदारी और जिम्मेदारी के साथ निभाया जाए। प्रेम की असली पहचान तभी है जब उसमें सम्मान, प्रतिबद्धता और नैतिकता हो।
इस्लाम का संदेश हमेशा संतुलन और मर्यादा का रहा है। यदि वेलेंटाइन डे या किसी भी अवसर पर इन मूल्यों का पालन किया जाए, तो यह न केवल व्यक्तिगत जीवन को सकारात्मक बनाएगा, बल्कि समाज में भाईचारे और सद्भाव को भी मजबूत करेगा।
संक्षेप में: प्रेम का उत्सव हो सकता है, लेकिन उसकी सीमा और रूप इस्लामी मूल्य, मर्यादा और जिम्मेदारी से तय होना चाहिए।
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