लेखक। अज़हर उमरी
(वरिष्ठ पत्रकार)
आगरा। आज जब ब्रज और आगरा की होली देश-दुनिया में प्रसिद्ध है, तो इसका एक सुनहरा अध्याय मुगलकाल से भी जुड़ा हुआ है। मुगल दरबार में होली केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि सांस्कृतिक मेल-मिलाप और शाही शान का प्रतीक थी।
🌸 अकबर के दौर की रंगीन शुरुआत
अकबर ने धार्मिक सहिष्णुता की नीति अपनाई। कहा जाता है कि वे अपनी राजपूत रानियों के साथ रंग खेलते थे। फतेहपुर सीकरी और आगरा के महलों में होली का उत्सव विशेष धूमधाम से मनाया जाता था। यह वह समय था जब दरबार में हिंदू-मुस्लिम संस्कृति का अनोखा संगम दिखता था।
🎨 जहांगीर और नूरजहां की होली
जहांगीर के समय की मिनिएचर पेंटिंग्स में उन्हें महारानी नूरजहां के साथ रंग खेलते दर्शाया गया है। इससे स्पष्ट होता है कि होली शाही जीवन का हिस्सा बन चुकी थी और दरबार में इसे हर्षोल्लास से मनाया जाता था।
🌹 शाहजहां का “ईद-ए-गुलाबी”
शाहजहां के दौर में होली को “ईद-ए-गुलाबी” और “आब-ए-पाशी” कहा जाता था। लाल किला और आगरा किला में इत्र मिले रंगों और गुलाबजल से होली खेली जाती थी। दरबार में संगीत, नृत्य और काव्य गोष्ठियों का आयोजन होता था।
⚖️ औरंगज़ेब का काल
औरंगज़ेब को अपेक्षाकृत कठोर शासक माना जाता है, लेकिन आम जनता के बीच होली का उत्सव जारी रहा। शाही संरक्षण भले कम हुआ हो, परंपरा नहीं टूटी।
🌼 ब्रज से दरबार तक
मथुरा और वृंदावन की लठमार और फूलों वाली होली की परंपराओं का प्रभाव मुगल दरबार तक पहुँचा। यही कारण है कि होली केवल धार्मिक उत्सव न रहकर सांस्कृतिक एकता का प्रतीक बन गई।
मुगलकाल की होली इस बात का प्रमाण है कि भारतीय संस्कृति की आत्मा समन्वय और सौहार्द में बसती है। आगरा की आज की रंगीन होली में भी उस शाही दौर की झलक मिलती है, जब रंग केवल चेहरे नहीं, दिलों को भी जोड़ते थे।

